सरकार के इतने कदम फिर भी चीनी महंगी क्यों? जानिए कीमत बढ़ने की असली वजह

National: देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी के बाद केंद्र सरकार ने स्टॉक लिमिट, जमाखोरी पर निगरानी और 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात जैसे कई कदम उठाए हैं। 1 अगस्त से डीलरों के स्टॉक पर सीमा लागू की गई है, जबकि 1 सितंबर से बड़े थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.
 

National: देश में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ महीनों में तेज बढ़ोतरी ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में शामिल है और घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें हाल के महीनों में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 23 अगस्त 2026 को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 62.47 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जबकि एक साल पहले यह 46.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी।

यानी एक साल में औसत खुदरा कीमत में करीब 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, 23 जुलाई को औसत कीमत 48.62 रुपये प्रति किलो थी, जो 30 दिनों में बढ़कर 62.47 रुपये हो गई।

कई राज्यों में 65 रुपये के पार पहुंची कीमत

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी सभी राज्यों में एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में खुदरा कीमत 65 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंच गई है। 23 अगस्त को ओडिशा में चीनी की कीमत 67.40 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई, जबकि एक सप्ताह पहले यह 55 रुपये थी।

रिपोर्टों के मुताबिक उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और ओडिशा समेत कई राज्यों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। कुछ राज्यों में पिछले एक साल के दौरान कीमतों में 40 से 50 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

सरकार ने उठाए कई कदम

बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने करीब एक दशक में पहली बार 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। वाणिज्य मंत्रालय ने 31 अक्टूबर 2026 तक इस आयात की अनुमति दी है।

इसके अलावा सरकार ने चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए डीलरों पर 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की है। यह सीमा 1 अगस्त से 30 नवंबर तक लागू रहेगी। वहीं, 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों की खपत से ज्यादा चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी।

सरकार का उद्देश्य बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना और जमाखोरी तथा सट्टेबाजी के जरिए कीमतों में होने वाली कृत्रिम बढ़ोतरी को रोकना है।

फिर भी कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें त्योहारों के मौसम से पहले मांग में बढ़ोतरी, शुरुआती स्टॉक में कमी, उत्पादन और खपत के बीच अंतर, मौसम से जुड़ी चिंताएं, जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कारण शामिल हैं।

अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की मांग बढ़ने से चीनी की खपत भी बढ़ जाती है।

इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) के मुताबिक, देश में चीनी का स्टॉक और आपूर्ति पर्याप्त है और त्योहारों के दौरान मांग पूरी करने में कोई बड़ी समस्या नहीं होनी चाहिए।

शुरुआती स्टॉक में आई कमी

ISMA के अनुसार, 30 सितंबर को समाप्त होने वाले मार्केटिंग वर्ष में भारत ने करीब 2.79 करोड़ टन चीनी का उत्पादन किया। देश की सालाना खपत करीब 2.80 से 2.85 करोड़ टन रहने का अनुमान है।

मिलों ने करीब 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया, जबकि करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात किया गया। इसके चलते नए मार्केटिंग वर्ष की शुरुआत में चीनी का शुरुआती स्टॉक करीब 35 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल करीब 50 लाख टन था।

यही शुरुआती स्टॉक में कमी बाजार में कीमतों को लेकर चिंता बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में से एक मानी जा रही है।

इथेनॉल को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्ट करने का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के कारण चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। कांग्रेस ने E20 नीति की समीक्षा की मांग की है।

हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने कहा है कि चीनी की मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में करीब 9 फीसदी रह गया है।

सरकार ने यह भी बताया कि देश में उत्पादित इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेष रूप से मक्का, से आता है।

क्या गन्ने का उत्पादन कम हुआ?

चीनी महंगी होने के पीछे गन्ने की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ शुगरकेन रिसर्च के निदेशक एसएन सुशील के मुताबिक, इस साल गन्ने का उत्पादन कम नहीं हुआ है, बल्कि इसमें बढ़ोतरी हुई है।

उनके अनुसार, सरकार के तीसरे अनुमान में गन्ने का उत्पादन करीब 500.06 मिलियन टन बताया गया है, जो पिछले साल के करीब 454.61 मिलियन टन के अनुमान से अधिक है।

उन्होंने यह भी कहा कि गन्ने की एक प्रमुख किस्म में रेड रॉट बीमारी की समस्या आई थी, लेकिन किसानों ने धीरे-धीरे उस किस्म का रकबा कम कर नई किस्मों को अपनाना शुरू कर दिया है। इसलिए इसे मौजूदा कीमत बढ़ोतरी का अकेला बड़ा कारण नहीं माना जा सकता।

किसानों, मिलों और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन बड़ी चुनौती

चीनी बाजार में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों, चीनी मिलों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

उपभोक्ता चाहता है कि चीनी सस्ती मिले, किसान को गन्ने का बेहतर मूल्य चाहिए और चीनी मिलें ऐसी कीमत चाहती हैं जिससे उनकी उत्पादन लागत और वित्तीय दबाव की भरपाई हो सके।

शुगर इंडस्ट्री के अनुसार, करीब 50 रुपये प्रति किलो की एक्स-मिल कीमत मिलों के लिए बेहतर मानी जा सकती है, क्योंकि उत्पादन लागत करीब 42-43 रुपये प्रति किलो रहने का अनुमान है।

कीमतें कब तक स्थिर होंगी?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का असर बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देगा। स्टॉक लिमिट और ड्यूटी-फ्री आयात जैसे उपायों से बाजार में आपूर्ति बढ़ने और जमाखोरी पर अंकुश लगने में समय लग सकता है।

ऐसे में आने वाले सप्ताहों में चीनी की कीमतों पर सरकार के आयात फैसले, त्योहारों की मांग, घरेलू स्टॉक और बाजार में वास्तविक आपूर्ति का असर महत्वपूर्ण रहेगा।

फिलहाल सरकार का दावा है कि देश में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता है, जबकि बाजार में बढ़ी कीमतें कई कारकों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदम आम उपभोक्ताओं को कितनी जल्दी राहत दिलाते हैं।