साहेबगंज से गायघाट तक… जदयू में इस्तीफ़ा और खींचतान से एनडीए के भीतर बढ़ी सिरदर्दी
Bihar Politics: बिहार की राजनीति में फिर से गरमाहट बढ़ गई है। एनडीए के भीतर सीटों को लेकर उठापटक इतनी तेज़ हो गई है कि अब इसका असर सीधे इस्तीफ़ों और सम्मेलनों पर दिखने लगा है।
जदयू नेता का इस्तीफ़ा, राजू सिंह पर सीधा वार
साहेबगंज विधानसभा क्षेत्र से जुड़े जदयू किसान और सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव राज कुमार शंकर (उर्फ़ राज कुमार) ने अचानक पार्टी से इस्तीफ़ा देकर बड़ा सियासी तूफ़ान खड़ा कर दिया। वजह बनी भाजपा मंत्री डॉ. राज कुमार सिंह राजू उर्फ़ राजू सिंह के कोल्ड स्टोर परिसर में 18 सितंबर को होने वाला प्रस्तावित एनडीए कार्यकर्ता सम्मेलन।
राज कुमार का कहना है कि यह सम्मेलन पारू विधानसभा क्षेत्र के दायरे में आता है, जबकि मामला साहेबगंज से जुड़ा है। इसे उन्होंने अपनी “स्थानीय राजनीतिक अस्मिता पर चोट” बताते हुए सख्त नाराज़गी जताई।
गौरतलब है कि राज कुमार पिछले दो साल से मंत्री राजू सिंह के खिलाफ़ चुनावी तैयारी में जुटे थे। चर्चा है कि वे विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संपर्क में हैं। 2020 में साहेबगंज सीट से राजू सिंह वीआईपी के टिकट पर जीते थे, बाद में उन्होंने भाजपा जॉइन कर ली। माना जा रहा है कि इस बार भी महागठबंधन में यह सीट वीआईपी को मिल सकती है। ऐसे में राज कुमार का इस्तीफ़ा एनडीए की खेमेबाज़ी को और गहरा करता दिख रहा है।
सोशल मीडिया पर गरजते दिखे राज कुमार
इस्तीफ़े के बाद राज कुमार ने सोशल मीडिया पर तीखा संदेश भी डाला-
“कदम-कदम पर लड़े थे तुमसे, कदम-कदम पर लड़ेंगे तुमसे। दम है कितना दमन में तेरे, देख लिया है, देखेंगे।”
उनका यह बयान साफ़ संकेत देता है कि आने वाले चुनाव में वे सीधी चुनौती देने को तैयार हैं।
गायघाट में भी बढ़ी टकराहट
सिर्फ़ साहेबगंज ही नहीं, बल्कि गायघाट विधानसभा सीट पर भी जदयू के भीतर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यहां जदयू नेता प्रभात किरण और लोजपा (आर) की पूर्व प्रत्याशी कोमल सिंह दोनों अपनी-अपनी दावेदारी पर अड़े हुए हैं। स्थिति इतनी बिगड़ी कि गुरुवार को होने वाला एनडीए सम्मेलन अचानक स्थगित करना पड़ा। यह सम्मेलन जदयू की ओर से आयोजित होना था, लेकिन सीट को लेकर खींचतान ने पूरे एनडीए खेमे को असहज कर दिया।
चुनाव से पहले एनडीए में बढ़ती दरार
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि साहेबगंज और गायघाट जैसी सीटों पर खींचतान एनडीए की एकजुटता पर बड़े सवाल खड़े करती है। भाजपा और जदयू के बीच बढ़ती तनातनी का सीधा असर मिशन 2025 की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।