उपेंद्र कुशवाहा का बड़ा बयान: “बेटे दीपक को मंत्री बनाना परिवारवाद नहीं, पार्टी बचाने की मजबूरी”

सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट जारी कर आलोचकों को दिया जवाब, तेजस्वी यादव से बेटे को बताया बेहतर
 

Bihar news: बिहार की राजनीति में जारी परिवारवाद की बहस के बीच उपेंद्र कुशवाहा ने पहली बार खुलकर यह स्वीकार किया है कि बेटे दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े नीतीश कैबिनेट में मंत्री बनाना उनकी “राजनीतिक मजबूरी” थी। लगातार उठ रहे सवालों के बीच राज्यसभा सांसद ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखकर अपने फैसले का बचाव किया और आलोचकों को दो टूक जवाब दिया।
 

“यदि इसे परिवारवाद कहते हैं, तो मेरी विवशता भी समझिए” उपेंद्र कुशवाहा ने स्पष्ट कहा कि पार्टी लगातार टूटती रही:
    •    2014 में 3 सांसद जीते, दो अलग हो गए
    •    2015 में दो विधायक थे, वे भी छोड़कर चले गए

उन्होंने लिखा कि इतनी मेहनत से पार्टी खड़ी करने के बाद जब लोग निकल जाते हैं तो पार्टी “फिर से शून्य पर पहुंच जाती है”। ऐसे में उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो “न बिके, न टूटे, न दगा दे”।

“यह निर्णय मेरे लिए ज़हर पीने जैसा था… पर पार्टी को बचाना था”

पोस्ट में कुशवाहा ने बेहद तीखे शब्दों में आलोचकों पर हमला बोला। उन्होंने लिखा- “सवाल ज़हर का नहीं था, वो तो मैं पी गया… तकलीफ़ उन्हें है कि मैं फिर से जी गया।”

उन्होंने कहा कि पार्टी को एक बार फिर टूटने से बचाने के लिए यह कदम आवश्यक था, चाहे इसके लिए उन्हें परिवारवाद का आरोप झेलना पड़े।

“दीपक नाकाबिल नहीं… इंजीनियर है, पढ़ा-लिखा है”

कुशवाहा ने अपने बेटे की योग्यता का बचाव भी किया और कहा कि दीपक प्रकाश कोई “फेल विद्यार्थी” नहीं बल्कि मेहनत से कंप्यूटर साइंस इंजीनियर बना है और अच्छे संस्कार लेकर राजनीति में आया है।

उन्होंने भरोसा जताया- “थोड़ा वक्त दीजिए, दीपक खुद को साबित करेगा-अवश्य करेगा।”

तेजस्वी यादव पर परोक्ष हमला

पोस्ट में कुशवाहा ने कहा कि किसी की पात्रता का मूल्यांकन जाति या परिवार से नहीं बल्कि काबिलियत से होना चाहिए। राजनीतिक हलकों में इसे तेजस्वी यादव पर एक सूक्ष्म लेकिन सीधा हमला माना जा रहा है।

पार्टी टूटने के पुराने दर्द ने बनाया ‘सेफ्टी लॉक’?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि
    •    दीपक को मंत्री बनाकर कुशवाहा ने पार्टी के अंदर एक सेफ्टी लॉक लगाया है।
    •    बाहरी नेताओं की तरह बेटा पार्टी नहीं छोड़ेगा, यही उनका राजनीतिक तर्क है।

इसी वजह से पत्नी स्नेहलता (जो विधायक हैं) की बजाय बेटे को कैबिनेट में जगह दी गई।

‘अलोकप्रिय फैसलों’ का भी जिक्र

कुशवाहा ने अपने पोस्ट में पुराने ‘अलोकप्रिय फैसलों’-जैसे पार्टी विलय का भी उल्लेख किया और कहा कि उन घटनाओं से उन्होंने सबक लिया है कि राजनीतिक अस्तित्व बचाना सबसे पहला काम है।