क्या ‘परिवारवाद’ की लकीर पार करेंगे नीतीश? राज्यसभा को लेकर निशांत की एंट्री पर सियासी हलचल तेज
संजय झा के बयान से बढ़ी चर्चा
जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने कहा कि पार्टी के कई नेताओं की राय है कि निशांत को राजनीति में आकर संगठन के लिए काम करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतिम फैसला खुद निशांत कुमार को लेना है।
सूत्रों के मुताबिक, राज्यसभा नामांकन में हो रही देरी के पीछे यही सस्पेंस बड़ी वजह माना जा रहा है। चर्चा है कि अगर निशांत सहमति देते हैं तो 4 या 5 मार्च को नामांकन दाखिल हो सकता है। अन्यथा जेडीयू की ओर से मनीष वर्मा और रामनाथ ठाकुर का नाम आगे बढ़ सकता है।
उपेंद्र कुशवाहा की भी प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि निशांत एक प्रतिभाशाली युवा हैं और उन्हें राजनीति में आना चाहिए, लेकिन यह जेडीयू का आंतरिक मामला है।
सबसे बड़ा सवाल—छवि पर असर?
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अगर निशांत कुमार राज्यसभा जाते हैं, तो क्या इससे नीतीश कुमार की दशकों पुरानी ‘परिवारवाद विरोधी’ छवि पर असर पड़ेगा?
नीतीश कुमार हमेशा वंशवाद की राजनीति के खिलाफ मुखर रहे हैं और अपने परिवार को सियासत से दूर रखा है। ऐसे में यह फैसला उनकी स्थापित राजनीतिक लाइन से अलग कदम माना जा सकता है।
क्या यह एग्जिट प्लान का संकेत?
राजनीतिक विश्लेषक इसे संभावित ‘ट्रांजिशन प्लान’ से भी जोड़कर देख रहे हैं-यानी नीतीश कुमार का सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूरी बनाना और नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति।
फिलहाल आधिकारिक घोषणा बाकी है, लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में यह मुद्दा फिलहाल सबसे गर्म है। आने वाले दिनों में जेडीयू का फैसला राज्य की सियासी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।