बिहार में हर डेढ़ दिन में भ्रष्टाचार की एक FIR, राजस्व विभाग के सबसे ज्यादा घूसखोर पकड़े गए, पुलिस भी पीछे नहीं
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ सम्राट सरकार की कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है. सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार में संलिप्त लोक सेवकों के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का शिकंजा लगातार कस रहा है. इसका असर कार्रवाई से लेकर आरोपियों को सजा दिलाने तक साफ दिखाई दे रहा है. निगरानी ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2026 में 16 अक्टूबर तक 22 भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाई जा चुकी है. जबकि पिछले 25 वर्षों यानी वर्ष 2000 से 2024 के दौरान भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने का वार्षिक औसत महज 5.6 था. इस तरह पिछले वर्षों के औसत की तुलना में इस वर्ष सजा दिलाने की दर में 293 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
इस कार्रवाई की जानकारी निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के महानिदेशक जितेंद्र सिंह गंगवार ने दी. डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने बताया कि वर्तमान में निगरानी ब्यूरो के स्तर से प्रत्येक डेढ़ दिन में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की जा रही है. औसतन हर तीन दिन में दो मामले दर्ज हो रहे हैं. वर्ष 2025 में प्रत्येक दो दिन में एक एफआईआर दर्ज होती थी, जबकि वर्ष 2024 में औसतन 11.5 दिनों में एक एफआईआर दर्ज की जाती थी. इससे स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की रफ्तार में काफी तेजी आई है. आज शुक्रवार को निगरानी ब्यूरो में आयोजित प्रोन्नति सम्मान समारोह के दौरान डीजी जितेंद्र गंगवार ने विभाग की उपलब्धियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के आंकड़े साझा किए. मौके पर इंस्पेक्टर से डीएसपी के पद पर प्रोन्नत हुए शालिग्राम कुमार को डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने कंधे पर स्टार लगाकर सम्मानित किया. पुलिस महकमे में 37 पुलिस निरीक्षकों को डीएसपी के पद पर प्रोन्नति दी गई है. इनमें निगरानी ब्यूरो के एक निरीक्षक भी शामिल हैं.
डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने बताया कि भ्रष्टाचार के मामलों में ट्रायल की प्रक्रिया को भी तेज करना प्राथमिकता है. वर्तमान में किसी मामले के ट्रायल और अंतिम फैसले तक पहुंचने में औसतन 13 वर्ष का समय लग रहा है. इसे कम करने के लिए अतिरिक्त विशेष निगरानी अदालतों के गठन, समय पर गवाही सुनिश्चित कराने और निर्धारित समय पर चार्जशीट दाखिल करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है. पिछले 25 वर्षों के दौरान ट्रैप, आय से अधिक संपत्ति यानी डीए और पद के दुरुपयोग से जुड़े एओपीए मामलों को मिलाकर औसतन 73 कांड दर्ज किए जाते थे. वर्ष 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 124 हो गया है. इसमें करीब 70 फीसदी की वृद्धि हुई है.
वहीं, रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ने यानी ट्रैप के मामलों में सबसे ज्यादा तेजी आई है. पिछले 25 वर्षों का औसत 47 मामले था, जबकि इस वर्ष अब तक 113 मामले दर्ज किए जा चुके हैं. इसमें 140 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वर्ष के अंत तक ट्रैप के मामलों की संख्या 142 तक पहुंचने की संभावना जताई गई है. इसी तरह आय से अधिक संपत्ति के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है. पिछले 25 वर्षों में डीए के औसतन आठ मामले दर्ज होते थे, जबकि इस वर्ष यह संख्या बढ़कर 10 हो गई है. वहीं, पद के दुरुपयोग से संबंधित एओपीए के दो मामले दर्ज किए गए हैं.
डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार के अनुसार, नए प्रावधान के तहत ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले संबंधित विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य है. इस कारण कार्रवाई में समय लग रहा है. निगरानी ब्यूरो की कार्रवाई में रिश्वत लेते पकड़े जाने वाले लोक सेवकों में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग सबसे आगे है. इसके बाद पुलिस, पंचायती राज, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन विभाग का स्थान है. इस वर्ष अब तक राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के 20, पुलिस के 17 और पंचायती राज विभाग के 12 लोक सेवक ट्रैप के दौरान पकड़े जा चुके हैं. ट्रैप की कार्रवाई में जब्त रिश्वत की औसत राशि 34 हजार 667 रुपये रही है.
शिक्षक जांच से जुड़े मामलों पर जानकारी देते हुए डीजी ने बताया कि पिछले 11 वर्षों में अब तक 1717 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं. इस दौरान प्रतिवर्ष औसतन 156 मामले दर्ज होते थे, जबकि अकेले वर्ष 2026 में 166 कांड दर्ज किए गए हैं. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी ब्यूरो की कार्रवाई सभी जिलों में जारी है. हालांकि, सबसे अधिक ट्रैप की कार्रवाई राजधानी पटना और इसके आसपास के क्षेत्रों में हुई है. ब्यूरो का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार में संलिप्त लोक सेवकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना और मामलों में समयबद्ध तरीके से सजा सुनिश्चित कराना है.







