दिल्ली अग्निकांड के बाद बड़ा सवाल: क्या बिहार के होटल और हॉस्टल सुरक्षित हैं, या किसी बड़े हादसे का इंतजार?
बिहार के बड़े शहरों में तेजी से होटल, लॉज, हॉस्टल और पीजी की संख्या बढ़ी है। राजधानी पटना के अलावा गया, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर, पूर्णिया और बेगूसराय जैसे शहरों में हजारों छात्र, नौकरीपेशा लोग और यात्री ऐसे भवनों में रहते हैं। खासकर पटना के मुसल्लहपुर हाट, भिखना पहाड़ी, कंकड़बाग, राजेंद्र नगर, बोरिंग रोड और पटेल नगर जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में छात्रावास और पीजी संचालित हो रहे हैं।
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि कई इमारतों में अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन पूरी तरह नहीं होता। कई स्थानों पर फायर अलार्म सिस्टम नहीं हैं, अग्निशमन यंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं, इमरजेंसी एग्जिट की व्यवस्था नहीं है और पुरानी विद्युत वायरिंग का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में किसी भी आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।
हर वर्ष बिहार में आग लगने की सैकड़ों घटनाएं सामने आती हैं। गर्मी के मौसम में शॉर्ट सर्किट, गैस सिलेंडर विस्फोट और बिजली संबंधी खामियों के कारण कई लोगों की जान चली जाती है। इसके बावजूद यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या राज्य में होटलों और हॉस्टलों का नियमित फायर ऑडिट किया जाता है? क्या सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराया जाता है? और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई होती है?
दिल्ली हादसे के बाद अब बिहार सरकार, नगर निकायों और अग्निशमन विभाग की तैयारियों को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यभर में होटल, लॉज, हॉस्टल और पीजी की व्यापक सुरक्षा जांच की आवश्यकता है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी संस्थानों के पास वैध फायर एनओसी हो और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था मौजूद हो।
सबसे बड़ी चिंता उन लाखों छात्रों की सुरक्षा को लेकर है, जो अपने भविष्य को संवारने के लिए घर से दूर रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में भेजते हैं, लेकिन उनके रहने की जगह कितनी सुरक्षित है, यह सवाल अब और गंभीर हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की घटना केवल एक शहर का हादसा नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। बिहार के लिए भी यह समय सतर्क होने का है। यदि समय रहते सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो किसी भी बड़े शहर में ऐसी त्रासदी दोहराई जा सकती है।
हादसे के बाद राहत और मुआवजा देना आसान होता है, लेकिन खोई हुई जिंदगियां वापस नहीं लौटतीं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या बिहार समय रहते सबक लेगा या फिर किसी बड़े हादसे के बाद जागेगा?







