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गांव में ही मिलेगा रोजगार! PACS और FPO को ‘बिजनेस हब’ बनाकर बिहार रचेगा आत्मनिर्भरता की नई कहानी

 
गांव में ही मिलेगा रोजगार! PACS और FPO को ‘बिजनेस हब’ बनाकर बिहार रचेगा आत्मनिर्भरता की नई कहानी
Bihar News: ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। कोऑपरेशन डिपार्टमेंट बिहार ने 25 मॉडल PACS और FPO के साथ तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसका मकसद इन संस्थाओं को सिर्फ ऋण तक सीमित रखने के बजाय रोज़गार सृजन और आर्थिक मजबूती का केंद्र बनाना है।

राजधानी पटना में आयोजित इस कार्यक्रम का फोकस साफ है- गांवों में ही रोज़गार के अवसर पैदा करना, ताकि लोगों को पलायन न करना पड़े और स्थानीय स्तर पर ही आय के साधन विकसित हो सकें। विभाग का लक्ष्य PACS को बाजार से जोड़कर उन्हें बहुद्देशीय और व्यवसायिक इकाइयों में बदलना है।

इस दौरान PACS और FPO को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, बीज और खाद्य विक्रेताओं, कीटनाशक कंपनियों और बड़े खरीदारों से जोड़ा जा रहा है, ताकि उनके उत्पाद सीधे बाजार तक पहुंच सकें। साथ ही राज्य के 8400 से अधिक PACS को डिजिटल बनाने की योजना पर भी तेजी से काम हो रहा है।

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए सहकारिता मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने स्पष्ट कहा कि अब समय आ गया है कि PACS और FPO पारंपरिक ढांचे से बाहर निकलकर प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और डायरेक्ट मार्केटिंग के जरिए मजबूत आर्थिक इकाइयों के रूप में उभरें। उन्होंने “क्रेडिट से कमर्शियल एंटरप्राइज” की दिशा में बदलाव को विभाग का मुख्य विज़न बताया।

विभाग के सचिव धर्मेंद्र सिंह ने इसे केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि “PACS को उद्यमी बनाने की पहल” बताया। वहीं निबंधक रजनीश कुमार सिंह ने कहा कि गांवों में ही रोजगार के अवसर बढ़ाकर आत्मनिर्भरता को मजबूत किया जाएगा।

प्रशिक्षण में मक्का आधारित पशु आहार, सरसों तेल प्रसंस्करण, मशरूम उत्पादन, वर्मी कम्पोस्ट जैसे कृषि आधारित सूक्ष्म उद्योगों पर फोकस किया जा रहा है। साथ ही NABARD, National Cooperative Development Corporation और Bihar State Cooperative Bank के जरिए वित्तीय सहायता, ऋण और सब्सिडी योजनाओं की जानकारी भी दी जा रही है।

इसके अलावा ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग की बारीकियों पर विशेषज्ञों द्वारा मार्गदर्शन दिया जा रहा है, ताकि स्थानीय उत्पाद “मेड इन बिहार” पहचान के साथ राष्ट्रीय बाजार तक अपनी जगह बना सकें।

यह पहल सिर्फ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि ग्रामीण बिहार को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की बड़ी रणनीति के रूप में देखी जा रही है।