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बिना नोटिस जमीन का रिकॉर्ड रद्द नहीं कर सकती सरकार, पटना हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Patna Highcourt:सबसे अहम बात यह है कि कोर्ट ने एक स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को संक्षिप्त कार्यवाही (summary proceedings) के ज़रिए रद्द नहीं किया जा सकता है. अगर राज्य किसी व्यक्ति के ज़मीन के मालिकाना हक पर सवाल उठाता है, तो उसे ज़मीन के रिकॉर्ड को एकतरफा रद्द करने के बजाय सिविल कोर्ट जाना चाहिए और उचित कानूनी कार्यवाही के ज़रिए अपना दावा साबित करना चाहिए.
 
BIHAR

Patna Highcourt: पटना हाई कोर्ट ने कटिहार जिले में दशकों पुराने भूमि रिकॉर्ड (जमाबंदी) को रद्द करने संबंधी बिहार सरकार की कार्रवाई को निरस्त कर दिया है. अदालत ने कहा कि राज्य सरकार उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना किसी नागरिक के संपत्ति संबंधी अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकती. कोर्ट ने विवादित जमाबंदी को बहाल करने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को बिना नोटिस और सुनवाई के समाप्त करना कानून के विपरीत है.

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जस्टिस सुरेंद्र पांडे की एकल पीठ ने स्वर्गीय रघुनाथ साह की पत्नी सुनीता रानी साह द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया. अदालत ने पाया कि प्रशासन ने परिवार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही उनके नाम दर्ज भूमि रिकॉर्ड रद्द कर दिए थे.

1967 में खरीदी गई थी जमीन

मामला कटिहार जिले की 78 डेसिमल जमीन से जुड़ा है. याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पति के माता-पिता ने वर्ष 1967 में पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) के माध्यम से यह जमीन खरीदी थी. इसके बाद उनके नाम पर म्यूटेशन हुआ और वे नियमित रूप से सरकार को लगान भी जमा करते रहे। बाद में यह संपत्ति रघुनाथ साह के नाम आई, जिनका वर्षों तक जमीन पर कब्जा रहा. परिवार को विवाद का पता तब चला, जब बिना किसी पूर्व सूचना के उनकी जमाबंदी रद्द कर दी गई और संबंधित जमीन पर सरकारी निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया.

बिना नोटिस रद्द किए गए रिकॉर्ड

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पांच दशक से अधिक समय से दर्ज भूमि रिकॉर्ड को बिना नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए रद्द कर दिया गया. उनका कहना था कि इतने लंबे समय से चले आ रहे अधिकारों को केवल प्रशासनिक आदेश के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता.

वहीं, राज्य सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि भूमि के मूल आवंटन-प्राप्तकर्ता को जमीन हस्तांतरित करने की अनुमति नहीं थी और बाद के लेन-देन सरकारी नियमों के विरुद्ध थे। इसी आधार पर जमाबंदी रद्द की गई.

सरकार की प्रक्रिया पर कोर्ट ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों के आदेश में याचिकाकर्ता के पूर्वजों के नाम दर्ज जमाबंदियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था. इसके बावजूद उन रिकॉर्ड्स को रद्द मानते हुए जमीन बिहार सरकार के नाम दर्ज कर दी गई.

अदालत ने यह भी कहा कि परिवार दशकों से जमीन का उपयोग कर रहा था, लगान जमा कर रहा था और वैध अधिकारों का प्रयोग कर रहा था. ऐसे में सर्किल ऑफिसर द्वारा उन जमाबंदियों को रद्द करना उचित नहीं था, जो मूल आदेश के दायरे में ही नहीं थीं.

सिविल कोर्ट जाने की दी सलाह

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को संक्षिप्त प्रशासनिक कार्यवाही के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता. यदि राज्य सरकार किसी व्यक्ति के स्वामित्व पर विवाद उठाना चाहती है, तो उसे सक्षम सिविल कोर्ट में जाकर कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना दावा साबित करना होगा.

अदालत ने माया देवी बनाम बिहार राज्य तथा बिहार राज्य बनाम हरेंद्र नाथ तिवारी जैसे पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना नोटिस और सुनवाई के नागरिकों को उनकी संपत्ति के अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

कोर्ट का आदेश

पटना हाई कोर्ट ने मिसलेनियस केस नंबर 14 (2017-18) की पूरी कार्यवाही को रद्द करते हुए जमाबंदी संख्या 2858 और 2859 को बहाल करने का निर्देश दिया. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार भूमि के स्वामित्व को चुनौती देना चाहती है, तो वह सक्षम न्यायिक मंच पर विधिसम्मत तरीके से अपना दावा प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होगी.