बिना MLA-MLC पद के दीपक प्रकाश कैसे बन गए मंत्री, सुप्रीम कोर्ट ने थमाया नोटिस, चली जाएगी कुर्सी?
Bihar Political News: बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से एक बेहद दिलचस्प और गंभीर संवैधानिक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. कोर्ट ने बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दीपक प्रकाश, बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने साफ पूछा कि क्या दीपक प्रकाश अब भी मंत्री पद पर हैं, जिस पर याचिकाकर्ता ने ‘हां’ में पुष्टि की.
बिहार के राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दीपक प्रकाश के खिलाफ ‘को वारंटो’ (किस अधिकार से) रिट जारी करने की मांग की है. बिहार चुनाव के बाद जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, तो 20 नवंबर 2025 को उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया गया. उस समय वे न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के. दीपक प्रकाश ने 15 अप्रैल 2026 तक काम किया. इस बीच राज्य में सत्ता की कमान बदली और सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बने. 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी की नई सरकार में दीपक प्रकाश को दोबारा उसी पंचायती राज विभाग का मंत्री बना दिया गया.
अब बड़ा सवाल है कि क्या दीपक प्रकाश की कुर्सी जा सकती है, आखिर संविधान क्या कहता है? आपको बता दें कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) यह लचीलापन देता है कि कोई भी गैर-विधायक व्यक्ति मंत्री बन सकता है. लेकिन इसके साथ एक सख्त शर्त जुड़ी है उसे 6 महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना ही होगा. यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है.
याचिकाकर्ता के वकील सुदीप चंद्रा का आरोप है कि सरकार ने एक चालाकी भरी तरकीब अपनाई. जब दीपक प्रकाश के 6 महीने पूरे होने वाले थे और वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन पाए (यहां तक कि हालिया विधान परिषद चुनावों में भी उन्हें टिकट नहीं मिला), तो सरकार बदलने के बहाने उन्हें दोबारा शपथ दिला दी गई. वकील ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, ‘इस्तीफा दो और मंत्री बन जाओ उन्होंने ठीक यही किया.’
याचिका में मांग की गई है कि दीपक प्रकाश की इस दूसरी नियुक्ति को तुरंत रद्द किया जाए. 7 मई तक उनके द्वारा पारित की गई सभी योजनाओं और प्रस्तावों को अमान्य घोषित किया जाए. मंत्री के तौर पर उन्हें मिले वेतन और भत्तों की वसूली की जाए. याचिका में साल 2001 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘एस. आर. चौधरी’ मामले का हवाला दिया गया है. उस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव जीते, लगातार दूसरी बार बैक-टू-बैक मंत्री नहीं बन सकता. ऐसा करना संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना का मज़ाक उड़ाना है.







