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मादुरो की गिरफ़्तारी से हिली वैश्विक राजनीति, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता पर मंडराया बड़ा सवाल

 
मादुरो की गिरफ़्तारी से हिली वैश्विक राजनीति, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता पर मंडराया बड़ा सवाल
Patna Desk: वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलास मादुरो की अमेरिकी हिरासत में गिरफ्तारी ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। अमेरिका ने इसे एक “तानाशाह” को हटाने की कार्रवाई बताया है, लेकिन भारत के लिए यह मामला सिर्फ किसी विदेशी नेता की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा गंभीर सवाल बन गया है।

स्कॉटलैंड के विख्यात शिक्षाविद और भू-राजनीतिक अर्थशास्त्री प्रोफेसर ध्रुव कुमार का कहना है कि यह कदम सिर्फ वेनेज़ुएला की राजनीति नहीं बदलता, बल्कि दुनिया के तेल मार्गों और ताकत के संतुलन को भी प्रभावित करता है। उनका मानना है कि अमेरिका अब केवल नक्शा ही नहीं, बल्कि तेल के रास्तों को भी अपने हिसाब से मोड़ने की ताकत दिखा रहा है।

रणनीतिक स्वायत्तता पर सीधी चोट

प्रोफेसर ध्रुव कुमार के अनुसार, भारत की विदेश नीति हमेशा से किसी महाशक्ति का मोहरा न बनने के सिद्धांत पर टिकी रही है। मादुरो की गिरफ्तारी इस सिद्धांत को चुनौती देती है, क्योंकि इसमें सैन्य ताकत, आर्थिक प्रतिबंध और संसाधनों पर नियंत्रण-तीनों का एक साथ इस्तेमाल हुआ है।
भारत न तो किसी तानाशाह का समर्थन करना चाहता है और न ही यह स्वीकार कर सकता है कि किसी देश की सरकार को बाहरी ताकत के बल पर बदला जाए।

ऊर्जा सुरक्षा: मौका भी और दबाव भी

ऊपरी तौर पर भारत आज वेनेज़ुएला पर पहले जितना निर्भर नहीं है। कभी रिलायंस और नयारा जैसी कंपनियां वहां से भारी कच्चा तेल खरीदती थीं, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और रूसी तेल की उपलब्धता के कारण यह कम हो गया।
फिर भी वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। अगर वहां हालात बदलते हैं, तो भारत के लिए पुराने प्रोजेक्ट और सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट फिर से शुरू हो सकते हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि इन संसाधनों पर नियंत्रण किसके हाथ में होगा। अगर अमेरिका प्राथमिकता सिर्फ अपने और अपने सहयोगियों को देता है और भारत पर राजनीतिक शर्तें थोपता है, तो यह मौका दबाव का औजार भी बन सकता है।

महाशक्तियों की रस्साकशी

वेनेज़ुएला अब अमेरिका, चीन और रूस के बीच टकराव का नया मैदान बन गया है। मादुरो को चीन और रूस का समर्थन मिला हुआ था। उनकी गिरफ्तारी से इन दोनों देशों का प्रभाव कमजोर होता दिख रहा है।
भारत के लिए यहां तीन बड़े खतरे उभरते हैं:
    1.    रेजीम चेंज की राजनीति का सामान्य होना – अगर यह चलन बन गया, तो कल किसी और देश के साथ भी ऐसा हो सकता है।
    2.    प्रतिबंधों का विस्तार – शिपिंग, बीमा और फाइनेंस तक रोक लगाकर किसी भी देश को झुकाया जा सकता है।
    3.    या तो–या की मजबूरी – लोकतंत्र बनाम तानाशाही की बहस में भारत की स्वतंत्र सोच दब सकती है।

ट्रंप का अमेरिका: अवसर या चुनौती?

ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका का रुख भारत के लिए मिला-जुला रहा है। एक तरफ चीन के खिलाफ सख्ती भारत के हित में है, लेकिन दूसरी तरफ टैरिफ, रूसी तेल पर दबाव और पाकिस्तान से फिर नजदीकी चिंता बढ़ाती है।
मादुरो की गिरफ्तारी दिखाती है कि अमेरिका अब सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने से भी नहीं हिचक रहा।

भारत को क्या करना चाहिए?

प्रोफेसर ध्रुव कुमार के मुताबिक भारत को भावुक नहीं, बल्कि व्यावहारिक रुख अपनाना होगा।
    •    लोकतंत्र का समर्थन करें, लेकिन किसी देश पर बाहरी नियंत्रण को सही न ठहराएं।
    •    वेनेज़ुएला में नए मौकों का इस्तेमाल व्यापारिक शर्तों पर करें, नीति स्वायत्तता गिरवी न रखें।
    •    रूस, खाड़ी, अफ्रीका और घरेलू उत्पादन को मजबूत कर ऊर्जा के विकल्प बढ़ाएं।
    •    खुद को ऐसा भागीदार बनाएं, जिसकी अहमियत किसी भी तेल-आधारित दबाव से ज्यादा हो।