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न्यायाधीशों के लिए जारी नई गाइडलाइंस में 'प्राॅसीक्यूट्रिक्स', 'लज्जा भंग' और 'वासना' जैसे शब्दों पर रोक

 
न्यायाधीशों के लिए जारी नई गाइडलाइंस में 'प्राॅसीक्यूट्रिक्स', 'लज्जा भंग' और 'वासना' जैसे शब्दों पर रोक

New Delhi: भारतीय अदालतों को पुरानी सोच और रूढ़िवादिता से मुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी समिति ने ऐतिहासिक कदम उठाया है. राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) द्वारा गठित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली समिति ने यौन अपराधों के मामलों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं. 74 पन्नों की इस विशेष रिपोर्ट में देश के सभी जजों को सुझाव दिए गए हैं कि वे अदालती फैसलों और सुनवाई के दौरान महिलाओं के लिए सम्मानजनक, सरल और कानूनी रूप से सही भाषा का इस्तेमाल करें.

यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर खुद संज्ञान लेने के बाद तैयार की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालतों में इस्तेमाल होने वाली भाषा केवल बातचीत का तरीका नहीं है, बल्कि यह निष्पक्ष न्याय और पीड़ित के सम्मान से जुड़ी है. जजों की असंवेदनशील टिप्पणियां पीड़ितों को मानसिक रूप से दोबारा दुखी करती हैं, जिससे समाज में लोग अपराध के खिलाफ आवाज उठाने से डरने लगते हैं.

विशेषज्ञ समिति ने निचली अदालतों के 125 फैसलों की जांच की. इसमें पाया गया कि आज भी पुराने और पीड़ित को ही दोषी ठहराने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है. नई गाइडलाइंस के मुताबिक, अब कोई भी जज पीड़िता के कपड़ों, उसकी पसंद-नापसंद, जीवनशैली या उसके चरित्र के आधार पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता है. इसके अलावा, अगर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में देरी हुई हो, या शरीर पर चोट के निशान न हों, तो इसे आधार बनाकर पीड़िता के दावे को झूठा नहीं माना जाएगा.

समिति ने बरसों से चले आ रहे कई आपत्तिजनक शब्दों को पूरी तरह बैन कर दिया है और उनकी जगह नए शब्द तय किए हैं.

प्राॅसीक्यूट्रिक्स: कोर्ट के फैसलों में अब इस कठिन शब्द की जगह 'सर्वाइवर', 'शिकायतकर्ता' या 'पीड़ित' लिखा जाएगा.

लज्जा भंग: इस पुराने मुहावरे की जगह अब 'शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन' शब्द का उपयोग होगा.

बेचारी नाबालिग या लाचार महिला: ऐसे दया दिखाने वाले शब्दों पर रोक लगा दी गई है. इनकी जगह सिर्फ 'महिला' या 'बाल सर्वाइवर' लिखा जाएगा.

वासना: 'वासना का शिकार' जैसे शब्दों की जगह सीधे 'यौन उत्पीड़न' या 'यौन हिंसा' लिखा जाएगा.

इज्जत और शर्म: किसी महिला की 'इज्जत लूटने' या 'परिवार की प्रतिष्ठा' जैसे शब्दों के बजाय अब केवल पीड़ित के अधिकारों और उसके नुकसान की बात होगी.

'जीवन बर्बाद होना': फैसले में यह लिखने के बजाय कि 'लड़की की जिंदगी बर्बाद हो गई', अब पीड़ित के 'मानसिक आघात' और उसकी मदद पर ध्यान दिया जाएगा.

सुनवाई के दौरान पीड़ितों को दोबारा उस डर और सदमे से बचाने के लिए कोर्ट की प्रक्रिया में बड़े बदलाव किए गए हैं. अब ऐसे मामलों की सुनवाई बंद कमरे में होगी. गवाही देते समय पीड़ित को आरोपी का चेहरा न देखना पड़े, इसके लिए अदालत में स्क्रीन या पर्दा लगाया जाएगा. बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा पूछे जाने वाले अपमानजनक सवालों पर जज तुरंत रोक लगाएंगे. सुप्रीम कोर्ट का यह कदम देश की कानूनी व्यवस्था को महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है.