जांच रिपोर्ट दिए बिना कार्रवाई नहीं: पटना हाईकोर्ट का अहम फैसला, कहा- रिपोर्ट की प्रति न देना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
Bihar news: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच रिपोर्ट के आधार पर प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे उस रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराना जरूरी है। अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं देना महज प्रक्रियात्मक कमी नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर सिंह एवं न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी अंकुर अग्रवाल बनाम फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला भारतीय खाद्य निगम (FCI) की ओर से एक हैंडलिंग एवं ट्रांसपोर्टेशन कॉन्ट्रैक्टर के खिलाफ की गई कार्रवाई से जुड़ा था।
FCI ने ठेका खत्म करने के साथ जब्त की थी सिक्योरिटी डिपॉजिट
मामले में FCI ने संबंधित संविदाकार का हैंडलिंग एवं ट्रांसपोर्टेशन कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही उसकी सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने और दो वर्षों के लिए निगम की निविदाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित करने की कार्रवाई भी की गई थी।
FCI की ओर से संविदाकार पर पर्याप्त संख्या में श्रमिक उपलब्ध नहीं कराने, खाद्यान्न की अनलोडिंग में देरी और अन्य संविदात्मक दायित्वों के निर्वहन में कथित लापरवाही के आरोप लगाए गए थे।
संविदाकार ने अपने जवाब में खराब पहुंच मार्ग, गोदाम की अव्यवस्था और बैंक से समय पर सूचना नहीं मिलने समेत कई कारणों का हवाला दिया था।
शो-कॉज नोटिस में जांच रिपोर्ट का था उल्लेख
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीके शाही ने अदालत के समक्ष दलील दी कि शो-कॉज नोटिस में एक जांच रिपोर्ट पर स्पष्ट रूप से भरोसा किया गया था और उसे नोटिस के साथ संलग्न भी बताया गया था। बावजूद इसके, अंतिम कार्रवाई से पहले संबंधित जांच रिपोर्ट की प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध नहीं कराई गई।
FCI की ओर से अधिवक्ता ब्रजेश वर्मा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जांच रिपोर्ट एक आंतरिक तथ्य-जांच दस्तावेज थी और निर्णय केवल उसी के आधार पर नहीं लिया गया, बल्कि संविदात्मक शर्तों के उल्लंघन को भी ध्यान में रखा गया था।
हाईकोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को बताया अहम
हाईकोर्ट ने पाया कि शो-कॉज नोटिस में जांच रिपोर्ट का स्पष्ट उल्लेख था और उस रिपोर्ट पर भरोसा किया गया था। ऐसे में संबंधित संविदाकार को रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराया जाना आवश्यक था, ताकि वह अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों और जांच के निष्कर्षों पर प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रख सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी जांच रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा निर्णय लिया जाना है, जिससे उसके अधिकारों या हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो अंतिम निर्णय से पहले उसे रिपोर्ट की प्रति देकर प्रभावी प्रतिवाद का अवसर देना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Managing Director, ECIL v. B. Karunakar मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, जब किसी जांच रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल निर्णय लिया जाना हो, तो अंतिम निर्णय से पहले रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराना निष्पक्ष सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पटना हाईकोर्ट की यह टिप्पणी प्रशासनिक और संविदात्मक मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी जांच रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए कार्रवाई करने की स्थिति में संबंधित पक्ष को उस रिपोर्ट को देखने और उसका जवाब देने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।







