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Patna News: किराए की मेट्रो पर करोड़ों का बोझ! पटना मेट्रो का लीज मॉडल बना बड़ा सवाल

 
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Patna news: पटना मेट्रो की शुरुआत के लिए अपनाया गया लीज मॉडल अब सवालों के घेरे में है। पुणे मेट्रो से किराए पर मंगाई गई ट्रेनों के लिए बिहार सरकार को करीब 21.15 करोड़ रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इतनी रकम से सीधे ट्रेनें खरीदी जातीं, तो यह राज्य की स्थायी संपत्ति बनती। सिर्फ तीन साल के लिए करोड़ों रुपये किराए में देना सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ माना जा रहा है।

देरी का नतीजा बना अस्थायी इंतजाम

पटना मेट्रो प्रोजेक्ट में देरी के कारण अपनी ट्रेनें समय पर नहीं खरीदी जा सकीं। इसी वजह से पुणे से ट्रेनें लाकर काम चलाया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह साफ दिखाता है कि योजना बनाने में पहले से ठोस तैयारी नहीं की गई। मेट्रो को जल्द शुरू करने के दबाव में यह अस्थायी समाधान अपनाया गया।

कमाई कम, खर्च ज्यादा

आंकड़े बताते हैं कि मेट्रो की आमदनी और खर्च में बड़ा अंतर है। एक ट्रेन का मासिक किराया करीब 58 लाख रुपये पड़ रहा है, जबकि शुरुआती दिनों में यात्रियों से होने वाली कमाई बहुत सीमित रही। रोजाना यात्रियों की संख्या करीब 7 से 8 हजार के बीच है, जो पटना जैसे बड़े शहर के हिसाब से कम मानी जा रही है।

सिर्फ तीन स्टेशनों तक सिमटी मेट्रो

अभी पटना मेट्रो केवल 3 से 4 किलोमीटर के छोटे से हिस्से में चल रही है। इसमें न्यू ISBT, जीरो माइल और भूतनाथ रोड—ये तीन स्टेशन ही चालू हैं। यात्रियों का कहना है कि इतने छोटे रूट के लिए 15 से 30 रुपये किराया देना ज्यादा लगता है। फिलहाल लोग इसे रोज़मर्रा के सफर से ज्यादा घूमने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

दूसरे शहरों से पीछे पटना

देश के कई शहरों जैसे लखनऊ, जयपुर और कोच्चि ने मेट्रो की शुरुआत अपनी खुद की ट्रेनों से की थी। वहीं पटना में किराए की ट्रेनों से काम चलाया जा रहा है। इससे बिहार की वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।

तीन साल बाद क्या होगा?

पटना मेट्रो के लिए ट्रेनें सिर्फ तीन साल के लिए किराए पर ली गई हैं। सवाल यह है कि तीन साल बाद अगर ट्रेनें खरीदी जाती हैं, तो उनकी कीमत और बढ़ सकती है। ऐसे में अभी खरीदारी न करने का फैसला कितना सही था, इस पर बहस तेज हो गई है।

रखरखाव पर भी भारी खर्च

मेट्रो के संचालन और रखरखाव के लिए दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को करीब 179 करोड़ रुपये दिए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर तकनीकी टीम तैयार न होने से राज्य को बाहर की एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे न सिर्फ खर्च बढ़ रहा है, बल्कि स्थानीय रोजगार के मौके भी कम हो रहे हैं।

भविष्य को लेकर चिंता

विपक्ष इस पूरे मामले को राजनीतिक दिखावा बता रहा है। लोगों के मन में यह सवाल भी है कि क्या किराए की ट्रेनों और भारी खर्च के सहारे पटना मेट्रो कभी आत्मनिर्भर बन पाएगी या यह योजना लंबे समय तक घाटे का सौदा बनी रहेगी।