सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बिहार मंत्री की पुनर्नियुक्ति का मामला, दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर उठे संवैधानिक सवाल
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने अपनी याचिका में दावा किया है कि दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी गैर-विधायक को केवल छह महीने तक मंत्री बने रहने की अनुमति दी जा सकती है और यह व्यवस्था अस्थायी प्रकृति की है।
विवाद की जड़ दीपक प्रकाश की दो बार हुई मंत्री नियुक्ति को लेकर है। याचिका के अनुसार उन्हें पहली बार 20 नवंबर 2025 को मंत्री बनाया गया था। बाद में सरकार के पतन के साथ मंत्रिपरिषद भंग हो गई, लेकिन नई सरकार के गठन के बाद 7 मई 2026 को उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी गई। याचिकाकर्ता का तर्क है कि छह महीने की संवैधानिक अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी और पुनर्नियुक्ति के जरिए इसे दोबारा शुरू नहीं माना जा सकता।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाकर छह महीने की छूट का विस्तार नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान की मंशा और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि दीपक प्रकाश से यह स्पष्ट कराया जाए कि वे किस संवैधानिक आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं। साथ ही पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक घोषित करने की भी मांग की गई है।
अब इस मामले पर सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि अदालत का फैसला न केवल इस नियुक्ति की वैधता तय करेगा, बल्कि भविष्य में गैर-विधायक मंत्रियों की नियुक्ति और पुनर्नियुक्ति को लेकर भी महत्वपूर्ण संवैधानिक दिशा-निर्देश दे सकता है।







