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बजट में महागठबंधन के घोषणापत्र के संकल्पों का होना चाहिए था समावेशन: माले

 

बिहार सरकार द्वारा आज पेश किए गए बजट पर भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि आज पेश किए गए बजट में 2020 के विधानसभा चुनाव के समय महागठबंधन के घोषणापत्र में जनता से किए गए वादों व संकल्पों को समावेशित करना चाहिए था. सरकार के समक्ष अब भी कई चुनौतियां हैं और उसे किसी भी प्रकार की खुशफहमी से बचना चाहिए, ताकि भाजपा जैसी फासीवादी ताकतों को कोई मौका न मिल सके.   


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उन्होंने कहा कि बजट पर भाजपा को बोलने का कोई भी नैतिक अधिकार नहीं है. मोदी सरकार द्वारा हाल ही में पेश किया गया केंद्रीय बजट पूरी तरह काॅरपोरेटपरस्त और देश की आम जनता के अधिकारों में कटौती करने वाला बजट है. उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट में मनरेगा सहित कई जनकल्याणकारी योजनाओं के मदों की राशि में कटौती कर दी गई. वित्तीय वर्ष 21-22 में जहां मनरेगा के लिए 98467 करोड़ रु. का आवंटन किया गया था, वहीं 22-23 में 89400 और इस चालू सत्र में महज 60000 करोड़ का आवंटन किया गया है. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में भी विगत वित्तीय वर्ष में जारी 12954 करोड़ रु. से राशि घटाकर 10787 करोड़ रु. कर दी गई है. ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राशि 37160 से घटाकर 36785 करोड़ रु. कर दी गई है. उस पर भाजपा नेता गिरिराज सिंह बिहार में मनरेगा की राशि रोक देने की ही धमकी दे रहे हैं. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के सवाल से भाजपा पहले ही भाग चुकी है. भाजपा के झांसे को बिहार की जनता अच्छे से समझती है.

उन्होंने बिहार के बजट के संबंध में आगे कहा कि सरकार ने बीपीएससी/एसएससी आदि विभागों में पद सृजन की घोषणा की है. यह अच्छा कदम है, लेकिन विश्वविद्यालयों और प्लस टू विद्यालयों में कार्यरत अतिथि शिक्षकों के समायोजन, लंबित शिक्षक बहाली को अविलंब शुरू करने, बहाली की प्रक्रिया को पारदर्शी व सुगम बनाने तथा विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक माहौल को ठीक करने व सत्र के नियमितीकरण, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ-साथ संबद्ध महाविद्यालयों में दशकों से कार्यरत शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को अतिथि शिक्षक को मिलने वाली न्यूनतम राशि देने आदि सवालों को समावेशित नहीं किया गया है. शिक्षा विभाग के तहत जारी स्कीमों में कार्यरत कर्मियों को सम्मानजनक वेतन व नियमितीकरण और साथ ही शिक्षा विभाग में बरसों तक अपनी सेवा देने वाले हजारों शिक्षा प्रेरकों की पुनबर्हाली होनी चाहिए थी.

बिहार की अर्थव्यवस्था में बेहद विषम स्थितियों में राज्य के बाहर काम कर रहे प्रवासी मजदूरों का बड़ा योगदान आज भी है, लेकिन प्रवासी मजदूरों के प्रति सरकार की उपेक्षा लगातार बनी हुई है. न तो राज्यपाल के अभिभाषण में इसका कोई जिक्र आया और न ही आज के बजट में. पूरे देश में मजदूर सप्लाई करने वाले प्रदेश की बन गई अपनी पहचान से बिहार मुक्त नहीं हो सका है. पलायन बदस्तूर जारी है. प्रवासी मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ राज्य के अंदर सभी विभागों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जानी चाहिए थी, लेकिन बजट में ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखी.

मनरेगा योजना पर भाजपा का तो लगातार हमला है ही, बिहार सरकार भी अपनी ओर से इस मद में राशि देने के प्रति लगातार उदासीन बनी हुई है. बजट में उम्मीद थी कि सरकार इसपर कोई सकारात्मक कदम उठाएगी.

आशा, रसोइया, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका को जीने लायक मासिक मानदेय देने के प्रति मोदी सरकार की उदासीनता जगजाहिर है. कोरोना काल में उत्कृष्ट भूमिका के बावजूद हालिया केंद्रीय बजट में उनके लिए किसी भी तरह का प्रावधान नहीं किया गया. बिहार सरकार से उम्मीद थी कि उनके प्रति बरती जा रही उपेक्षापूर्ण नीति के बरक्स महागठबंधन के घोषणापत्र के आलोक में तमाम स्कीम वर्कर्स को राहत मिलेगा, लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाना बेहद अफसोसजनक है.

सरकार का खुद का दावा है कि अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका सर्वप्रमुख है. ऐसा मानते हुए भी सरकार एपीएमसी ऐक्ट की पुनबर्हाली की मांग पर चुप ही रही. यदि किसानों को उनके फसलों का सही दाम नहीं मिलेगा तब हमारी अर्थव्यवस्था कहां जाएगी? बटाईदार किसानों का रजिस्ट्रेशन और उन्हें सारी सरकारी सुविधाएं प्रदान करने आदि विषयों पर भी किसी भी प्रकार की चर्चा नहीं की गई है. अब जब भाजपा सरकार से बाहर है तो यह उम्मीद की जा रही थी कि सरकार भूमि सुधार जैसे एजेंडों पर भी कदम बढ़ाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. किसानों को कृषि कार्य के लिए मुफ्त में बिजली उपलब्ध कराने के सवाल पर भी बजट चुप है.

सरकार हर घर बिजली योजना की चर्चा करती है, लेकिन राज्य की आम जनता प्रीपेड मीटर और कई गुना ज्यादा राशि वाला बिजली बिल भुगतान से परेशान है. गांव-गांव में सैकड़ों दलित-गरीब बस्तियों के घरों का बिजली कनेक्शन काटे जाने और उपभोक्ताओं पर मुकदमा दर्ज करने की घटनायें हुई हैं. हर घर बिजली योजना के नाम पर बिजली का निजीकरण कहीं से भी स्वीकार नहीं है.

यह सही है कि केंद्र की भाजपा सरकार का बिहार के साथ दोयम रवैया लगातार जारी है, ऐसी स्थिति में बिहार सरकार के सामने चुनौती और भी बढ़ जाती है. समाज विज्ञानियों ने बारंबार कहा है कि कृषि क्षेत्र की संरचना में व्यापक बदलाव के बिना बिहार में सच्चे अर्थों में जनपक्षीय विकास संभव नहीं है. साथ ही, बिहार सरकार को कृषि आधारित उद्योग-धंधों के विकास का भी रोडमैप लेकर आना चाहिए. यही वह रास्ता है, जिसके जरिए मजदूरों की सप्लाई करने वाला बिहार कल की तारीख में एक विकसित प्रदेश बन सकता है.