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छत्तीसगढ़ प्लांट हादसे में मजदूरों की मौत का कौन देगा जवाब? क्या यह पहली बार हुआ है या हर साल इनकी मौत केवल कागजों में सिमट कर रह जाती है? आखिर सरकार और प्रशासन हादसों को लेकर अब समझेगी अपनी जवाबदेही

Gaya: "पापा चले गए, कैसे रहेंगे हमलोग. एक बहन की शादी हुई है. पापा ही घर में कमाने वाले थे. काम मिलता तो यहीं रहते. हम आठवीं तक पढ़े हैं."
 
Bihar Gaya News
Gaya: छत्तीसगढ़ प्लांट हादसे में गुरुवार को बिहार के गया के 6 मजदूरों की मौत हो गई, जबकि तीन की हालत गंभीर है. मरने वाले सभी मजदूर कुछ दिन पहले ही काम की तलाश में घर से करीब 600 किलोमीटर दूर बिलासपुर गए थे. जब से ये मनहूस खबर आई है, परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है. पूरा गांव चीत्कार और विलाप से गूंज रहा है. सभी मृतक गया जिले के डुमरिया प्रखंज के गोटीबांध गांव के रहने वाले थे. इनमें एक पिता-पुत्र भी शामिल हैं.
हादसे में 6 मजदूरों की मौत: प्लांट हादसे में जिन छह मजदूरों की जान गई है, उनमें श्रवण भुइयां (22 वर्ष), राजदेव भुइयां (22 वर्ष), जितेंद्र भुइयां (37 वर्ष), बद्री भुइयां (42 वर्ष), विनय भुइयां (40 वर्ष) और सुंदर भुइयां (40 वर्ष) शामिल हैं. इनमें से सुंदर और राजदेव पिता और पुत्र हैं.
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काम की तलाश में गए, मिली मौत: गांव की आबादी लगभग 150 घरों की है, जिसमें 4 जातियों के लोग बसते हैं. इनमें मांझी-मुसहर, विश्वकर्मा, ठाकुर और अन्य जाति के लोग रहते हैं लेकिन गांव में दलित आबादी की संख्या अधिक है.
गांव में मांझी समाज मजदूरी पर आश्रित है. वो गांव या आसपास के क्षेत्रों में मजदूरी के लिए जाते थे लेकिन पहली बार ये 14 लोग एक ठेकेदार के माध्यम से छत्तीसगढ़ गए थे. सभी को प्रति माह 14,000 रुपये देने का प्रस्ताव दिया गया था. साथ ही कंपनी की तरफ से ही खाना दिया जा रहा था.
बेटी की शादी के लिए लिया था कर्ज: सुंदर भुइयां की बेटी खुशबू कुमारी कहती हैं कि मेरी शादी के लिए पिता ने समूह से कर्जा लिया था. उसी कर्ज को चुकाने के लिए वह छत्तीसगढ़ गए थे. वह बताती है कि जहां कच्चा मकान है, हमारे पास उतनी ही जमीन है.
खेती के लिए जमीन नहीं है कि हम उसमें खेती-बाड़ी करते. पिता और भाई मजदूरी करते थे लेकिन उससे नहीं हो पा रहा था. जिस वजह से पहले पिता गए और फिर भाई को भी बुला लिया.
खुशबू कहती है कि एक ठेकेदार ने बताया था कि 14000 प्रति महीने मजदूरी और खाने-पीने की सुविधा दी जाएगी. उन्हें स्टील के प्लांट में काम करना है. पहले पिताजी कमाने गए थे.
पीछे से मेरे भाई राजदेव भी पीछे से रविवार को काम करने गए थे लेकिन अगर हमें मालूम होता कि भाई और पिता को मजदूरी के बदले मौत मिलेगी तो हम कभी उन्हें जाने नहीं देते. हम तो शादी भी नहीं करते.
'नहीं मिलता किसी योजना का लाभ': खुशबू की मानें तो उसके परिवार को किसी भी तरह की सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है. वह कहती है, 'हमारा मिट्टी का घर है. प्रधानमंत्री आवास योजना या कोई और सरकारी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता.'
"कल (गुरुवार) 8 बजे सुबह बाबू जी फोन किए थे, तब बात हुई थी. फिर 10 बजे फोन आया कि मौत हो गई सबकी प्लांट में. पहली बार पापा और भाई काम करने गए थे. ठेकेदार लेकर गए थे छत्तरपुर में काम करने. पहले यहीं पर रहकर लेबर का काम करते थे.
तीन लोन लिए थे मेरी शादी के लिए. झारखंड में मेरी शादी हुई है. उसी के लिए कर्जा चुकाने और पैसा कमाने गए थे छत्तीसगढ़. 5 भाई और एक बहन है हमको."- खुशबू कुमारी, सुंदर भुइयां की बेटी
विनय का परिवार बेहाल: ऐसा ही दर्द विनय मांझी की बेटियां अस्मिता कुमारी, क्रांति, खुशी, प्रीति कुमारी और इकलौते बेटे मिथुन मांझी और बूढ़ी मां मालती देवी का भी है. विनय भी एक बेटी की शादी में लिए कर्ज के बीच में दबा हुआ था.
10 दिनों पहले ही वो भी गांव के 11 लोगों के साथ गया था. गोटीबांध गांव से मांझी समाज के 14 लोग मजदूरी के लिए छत्तीसगढ़ गए थे. पहली खेप में 11 लोग 7 जनवरी को गए थे, जिस में विनय भी शामिल थे.
'जानते तो लकड़ी चुनकर कमा लेते': विनय मांझी की बेटियां रह-रहकर बेहोश हो जा रही है. उसके घर में भी गुरुवार को सुबह 10 बजे से ही चूल्हा नहीं सुलगा नहीं है. क्रांति कुमारी कहती है कि सुबह 9 बजे जंगल की ओर जलावन की लकड़ी लाने गई थी.
अचानक 10 बजे लगा कि मेरी तबीयत खराब हो जाएगी. मन विचलित होने लगा तो लकड़ी लिए बिना ही घर वापिस आ गए. मां और बहनें चीख-पुकार रही थी. पूछने पर मां बोली, 'बेटी तुम्हारे पिताजी नहीं रहे. हमारी दुनिया उजड़ गई.
"पापा चले गए, कैसे रहेंगे हमलोग. एक बहन की शादी हुई है. पापा ही घर में कमाने वाले थे. काम मिलता तो यहीं रहते. हम आठवीं तक पढ़े हैं."- क्रांति कुमारी, विनय की बेटी
मां का रो-रोकर बुरा हाल: वहीं पास में बैठी विनय की वृद्ध मां कुंती भी लगातार रोए जा रही है. बुढ़ापे और बेटे के सदमे में उनकी आवाज भी नहीं निकल रही थी. जब ईटीवी भारत संवाददात ने उ से बात करने का प्रयास किया तो वो यही कहती रही कि मेरा बेटा मेरा बाबू. कौन देखा मेरी पोतियों को, कौन देखेगा मुझे? मेरे बुढ़ापे का सहारा छिन गया है. यही था जो, मेरी देखभाल करता था.
कंपकपाते हाथों और लड़खड़ाती आवाज में कहते हैं, 'बेटा को मना किया था लेकिन क्या करें साहब गरीबी जो ना करा दे.' हालांकि उनका बेटा कल्पू जीवित है, वह भी इस हादसे में घायल हुआ है.
पास में ही समुदायिक भवन से 100 गज की दूरी पर श्रवण भुइयां और जितेंद्र भुइयां का भी घर है. इनकी भी मृत्यु हो चुकी है. श्रवण भुइयां को एक साल का बेटा का है, जबकि जितेंद्र भुइयां को 6 महीने की एक बेटी है. ये दोनों आपस में गोतिया (रिश्तेदार) हैं. दुखद ये है कि जितेंद्र के माता-पिता की पहले ही मौत हो चुकी है. अब इनके घर में पुरुष की शक्ल में कोई नहीं है. जितेंद्र का शव लाने के लिए उनकी बेटी छत्तीसगढ़ गई हुई है.
वहीं, बद्री भुइयां और उनका छोटा भाई रामस्वरूप एक साथ गए थे. घटना के समय रामस्वरूप तो बच गए लेकिन बद्री की मौत हो गई. बद्री के भतीजे रवि कहते हैं, 'उनको अपनी भतीजी की शादी करनी थी. इसीलिए दोनों चाचा घर से बाहर मजदूरी के लिए गए थे. गांव में अभी काम नहीं मिल रहा था, इसलिए घरबार चलाना मुश्किल था. हम रिश्ते में भतीजा लगते हैं अब उनके घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा.'
'जाता तो मैं भी मर जाता': गांव के जयराम कहते हैं कि वह भी अपने गांव के लोगों के साथ छत्तीसगढ़ मजदूरी के लिए जाने वाले थे लेकिन बेटे ने मना कर दिया. अगर मैं उस दिन चला गया होता तो मेरा भी यही हाल होता. इस दर्दनाक घटना की सूचना मिली तो परिवार के लोग मुझे कहने लगे कि अच्छा हुआ कि आप नहीं गए लेकिन समस्या तो अब भी है कि गांव में रहकर करेंगे क्या? क्योंकि रोजगार का कोई साधन नहीं है.
मौत की वजह से आक्रोश में ग्रामीण: गांव में सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी देखने को मिल रही है. मांझी समाज के लोगों का कहना है कि हमारे समाज के जीतनराम मांझी और उनके पुत्र संतोष सुमन मंत्री हैं, जबकि उनकी दीपा मांझी विधायक है लेकिन इसके बावजूद हमारे समाज के लोगों की स्थिति नहीं बदली. वे कहते हैं कि अगर गांव में ही रोजगार मिल जाता तो वह बाहर क्यों जाते?
"अगर गांव में रहते हैं तो खेत में मजदूरी के अलावा कोई साधन नहीं बचता. जंगल में अगर जलावन की लकड़ी लाने भी गए तो वन विभाग के लोग हमें तंग करते हैं. हम करें तो क्या करें. पहले तो इस इलाके में नक्सलियों ने हमें नुकसान पहुंचाया और उनके कारण हम पुलिस से तबाह हुए. अब जब नक्सल खत्म हुआ तो रोजगार के लिए मर रहे हैं, आखिर यह स्थिति कैसे चलेगी?"- अखिलेश मांझी, ग्रामीण
पीड़ित परिवार से मिले मांझी: इस बीच स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने गांव में पहुंचकर मृतकों के परिवार से मुलाकात की और उन्हें सांत्वना दी. उन्होंने कहा कि वह छत्तीसगढ़ सरकार और बिहार सरकार से संपर्क में हैं.
हमने एसआईटी बनाकर जांच कराने की मांग की है. अगर मानवीय कारणों या तकनीकी कमियों के कारण घटना हुई है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए. पीड़ित परिवारों को मुआवजे की घोषणा कर दी गई है.
रोजगार के सवाल पर भड़के केंद्रीय मंत्री: वहीं, रोजगार के सवाल पर मांझी भड़क गए. उन्होंने कहा, 'अगर किसी को विकास नजर नहीं आता है तो मुझे कुछ नहीं कहना है. नहीं तो इमामगंज डुमरिया का विकास जिसको नहीं दिखता है तो क्या कहें. यहां रोड बन रहे हैं, पुल बना रहे हैं, एक्सप्रेसवे बना रहे हैं. 2015 से पहले की हालत देखिए, जब हम यहां के विधायक नहीं थे. 2015 के बाद सिर्फ यहां नहीं, बल्कि समस्त बिहार में मांझी लोगों का विकास हुआ है.