33 साल पुराना ₹300 घूस केस: हाईकोर्ट ने 2 साल की सजा को किया सिर्फ 1 महीना..जानिए इस केस से जुड़ा पूरा मामला?
Ranchi: महज 300 रुपये की रिश्वत के एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी को बड़ी राहत दी है। करीब 33 साल पुराने रिश्वत मामले में अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दो साल के कठोर कारावास की सजा को घटाकर एक माह एक दिन कर दिया। अदालत ने आरोपी की उम्र, लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया और उसके साफ आपराधिक रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए सजा कम करने का फैसला किया।

मामला वर्ष 1993 का है। धनबाद की वासुदेवपुर कोलियरी में तत्कालीन पीएफ क्लर्क समीर कुमार चौधरी पर 300 रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। सीबीआई ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई करते हुए रिश्वत की रकम बरामद की थी।
300 रुपये रिश्वत का 33 साल पुराना मामला
मामला 22 मार्च 1993 का है। आरोप था कि वासुदेवपुर कोलियरी में पीएफ क्लर्क के पद पर तैनात समीर कुमार चौधरी ने पूर्व माइनर लोडर रामधारी हरिजन के लंबित सीएमपीएफ एरियर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए 300 रुपये की रिश्वत मांगी थी।
शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने कार्रवाई की और आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया। इसके बाद लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद मामला ट्रायल कोर्ट तक पहुंचा।
2005 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी दो साल की सजा
सीबीआई की विशेष अदालत ने करीब 12 साल बाद, 2005 में, समीर कुमार चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीर कुमार चौधरी ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की। इस दौरान मामला लंबे समय तक हाईकोर्ट में लंबित रहा और आरोपी को करीब तीन दशक से अधिक समय तक कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने रिश्वत की रकम की बरामदगी और गवाहों के बयानों को लेकर सवाल उठाए। दलील दी गई कि रिश्वत के रुपये आरोपी की जेब से नहीं, बल्कि उसकी दराज से मिले थे। साथ ही गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने की बात भी कही गई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की मेरिट के आधार पर दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया। अदालत ने सजा की अवधि को लेकर आरोपी की परिस्थितियों पर अलग से विचार किया।
33 साल तक मुकदमा चलना भी माना बड़ा दंड
जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की पीठ ने सजा पर विचार करते हुए आरोपी की उम्र, मुकदमे की लंबी अवधि और उसके पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा।
कोर्ट ने माना कि आरोपी पिछले 33 वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहा है और इतने लंबे समय तक मुकदमे में रहना अपने आप में एक महत्वपूर्ण दंड की तरह है।
दो साल की सजा घटकर हुई 1 माह 1 दिन
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दो साल के कठोर कारावास की सजा को घटाकर एक माह एक दिन कर दिया। चूंकि आरोपी पहले ही इतनी अवधि जेल में बिता चुका था, इसलिए संशोधित सजा पूरी मानी गई और उसे इस मामले में बड़ी राहत मिल गई।
इस तरह 300 रुपये की रिश्वत से शुरू हुआ मामला करीब 33 साल की कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट के फैसले के साथ खत्म हुआ।







