361 साल पुराना मंदिर, जन्माष्टमी की खास रात और विशेष अनुष्ठान- जानिए मदन मोहन मंदिर की कहानी
Ranchi: जन्माष्टमी के अवसर पर रांची के बोड़ेया स्थित ऐतिहासिक मदन मोहन मंदिर, जिसे कृष्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, एक बार फिर भक्ति और उत्सव का केंद्र बन गया है। करीब 361 वर्ष पुराने इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं।

जन्माष्टमी के मौके पर भगवान मदन मोहन का भव्य श्रृंगार, अभिषेक, झूलन, जन्मोत्सव और विशेष आरती सहित कई कार्यक्रम हो रहे हैं। मंदिर परिसर में जागरण का भी आयोजन किया जा रहा है। जन्माष्टमी पर रांची के अलावा झारखंड के विभिन्न हिस्सों के साथ पश्चिम बंगाल, कोलकाता और छत्तीसगढ़ से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा रही है।

1665 में रखी गई थी मंदिर की नींव
मदन मोहन मंदिर का इतिहास मुगलकाल से जुड़ा बताया जाता है। मंदिर में मौजूद शिलालेख के अनुसार संवत 1722 यानी 1665 ईस्वी में वैशाख शुक्ल दशमी के दिन नागवंशी राजा रघुनाथ शाह की उपस्थिति में स्थानीय जमींदार लक्ष्मी नारायण तिवारी ने मंदिर की नींव रखी थी।
इसके करीब तीन वर्ष तीन महीने बाद संवत 1725 यानी 1668 में मंदिर की चहारदीवारी और मुख्य द्वारों के निर्माण की शुरुआत हुई। शिलालेख के अनुसार संवत 1739 यानी 1682 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
मंदिर निर्माण की कुल लागत शिलालेख में 14,001 रुपये दर्ज होने की बात कही जाती है।
शिलालेख में दर्ज है मंदिर की सुरक्षा से जुड़ी चेतावनी
मंदिर में मौजूद शिलालेख केवल इसके निर्माण का इतिहास नहीं बताता, बल्कि इसकी सुरक्षा को लेकर धार्मिक चेतावनी का भी उल्लेख करता है। इसमें मंदिर को नुकसान पहुंचाने को गंभीर धार्मिक पाप के समान बताया गया है।
इसी वजह से मदन मोहन मंदिर को केवल पूजा का स्थल ही नहीं, बल्कि झारखंड की मध्यकालीन स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण प्रमाण के तौर पर भी देखा जाता है।
12 नक्काशीदार पत्थरों के स्तंभों पर टिका है मंदिर
मंदिर की वास्तुकला भी इसे खास बनाती है। इसकी बनावट में उत्तर-मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य और मुगलकालीन शैली का मिश्रण दिखाई देता है।
बताया जाता है कि करीब 1,140 वर्ग फीट के मजबूत चबूतरे पर मंदिर का निर्माण किया गया है। मुख्य मंदिर 12 नक्काशीदार ग्रेनाइट पत्थरों के स्तंभों पर टिका है। चबूतरे से छत तक इन स्तंभों की ऊंचाई करीब 11 फीट 9 इंच बताई जाती है।
मंदिर के चारों ओर करीब 3 फीट 5 इंच मोटी दीवार होने की जानकारी भी मिलती है। सदियों बीत जाने के बाद भी मंदिर की मूल संरचना इसकी प्राचीन निर्माण तकनीक और मजबूती की कहानी कहती है।
चोरी हो गई थी भगवान की मूल अष्टधातु प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में पहले भगवान मदन मोहन और राधा जी की अष्टधातु प्रतिमाएं स्थापित थीं। बताया जाता है कि दोनों प्रतिमाओं का वजन करीब 45-45 किलोग्राम था।
5 सितंबर 1953 को भगवान श्रीकृष्ण की मूल अष्टधातु प्रतिमा चोरी हो गई। इसके बाद वर्ष 1960 में प्रसिद्ध व्यवसायी गंगा प्रसाद बुधिया के सहयोग से मंदिर में संगमरमर की नई प्रतिमाएं स्थापित कराई गईं।
बाद में वर्ष 1980 में वैष्णव परंपरा के अनुरूप पीतल की प्रतिमाएं शास्त्रोक्त विधि से स्थापित की गईं। वर्तमान में इन्हीं प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की जाती है।
गर्भगृह से जुड़ी है अनोखी पारंपरिक रस्म
मदन मोहन मंदिर की सबसे खास परंपराओं में गर्भगृह से जुड़ी मान्यता भी शामिल है। परंपरा के अनुसार आम श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती और मुख्य पुजारी ही वहां नियमित पूजा करते हैं।
हालांकि, लक्ष्मी नारायण तिवारी के वंशज परिवार में विवाह के दौरान एक विशेष रस्म के तहत नवविवाहित वर-वधू को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। इस दौरान वधू राधारानी को सिंदूर अर्पित करती है।
परिवार की परंपरा के अनुसार इस रस्म के बाद बहू दोबारा गर्भगृह में प्रवेश नहीं करती।
सदियों पुरानी जल संरक्षण व्यवस्था भी चर्चा में
मंदिर की प्राचीन इंजीनियरिंग भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। मंदिर की छत पर ‘पनसोखा’ जैसी जल निकासी और भूजल पुनर्भरण व्यवस्था होने की बात कही जाती है।
बताया जाता है कि बारिश के दौरान छत पर जमा पानी पाइपों के जरिए जमीन के भीतर पहुंचता था। स्थानीय मान्यताओं और उपलब्ध विवरणों के अनुसार इस तरह की जल संरक्षण व्यवस्था ने मंदिर परिसर के आसपास मौजूद ऐतिहासिक तालाब और कुएं को लंबे समय तक जल से जुड़े रखने में भूमिका निभाई।
जन्माष्टमी पर भव्य आयोजन, दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
हर वर्ष जन्माष्टमी के मौके पर मदन मोहन मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस वर्ष भी भगवान मदन मोहन के जन्मोत्सव को लेकर विशेष पूजा-अर्चना, भव्य श्रृंगार, अभिषेक, झूलन, आरती और जागरण का आयोजन किया जा रहा है।
रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के साथ मंदिर परिसर भक्ति और उत्सव के माहौल में डूब जाएगा।
361 साल से कायम है आस्था
बोड़ेया का मदन मोहन मंदिर आज रांची की धार्मिक पहचान के साथ-साथ उसकी ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। 1665 में रखी गई नींव से लेकर आज तक इस मंदिर ने कई दौर देखे, लेकिन भगवान मदन मोहन के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बनी रही।
जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर में जुटने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इसी अटूट आस्था और सदियों पुरानी परंपरा की गवाही देती है। यहां इतिहास केवल पत्थरों और शिलालेखों में दर्ज नहीं है, बल्कि आज भी पूजा, परंपरा और उत्सव के रूप में जीवंत नजर आता है।







