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सालों की प्रतीक्षा, कई बाधाएं अनगिनत अधूरी योजनाएं और लंबे संघर्षों के बाद रांची के सांस्कृतिक भविष्य का नया अध्याय शुरू

Jharkhand Desk: 2010 के बाद भवन की हालत बिगड़ती गई. दीवारें टूटने लगीं, संरचना कमजोर पड़ गई और 2011 में बिल्डिंग डिवीजन ने इसे कंडम घोषित कर दिया. इसके बाद वर्षों तक योजनाएं बनती रहीं, प्रस्ताव फाइलों में घूमते रहे, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठ सका. रांची को एक नए, सुरक्षित और आधुनिक सांस्कृतिक स्थल की सख्त जरूरत थी.
 
JHARKHAND TOWN HALL

Jharkhand Desk: सालों की प्रतीक्षा, कई बाधाएं अनगिनत अधूरी योजनाएं और लंबे संघर्षों के बाद रांची आखिरकार अपना नया सांस्कृतिक मुकाम पाने जा रहा है. शहर के पुराने और कमजोर हो चुके टाउन हॉल की जगह अब उभरकर सामने आया है आधुनिक, विशाल और तकनीकी रूप से उन्नत रविंद्र भवन लगभग 292 करोड़ रुपये की लागत से तैयार पूर्वी भारत का सबसे बड़ा और सर्वाधिक अत्याधुनिक कला केंद्र. यह सिर्फ एक भवन नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा का नया घर है, जो टूटे इतिहास से नए भविष्य की रोशनी गढ़ता है.

rabindrabhawan

टाउन हॉल जहा से बदलाव की कहानी शुरू हुई

कचहरी स्थित पुराना टाउन हॉल कभी रांची का सांस्कृतिक केंद्र हुआ करता था. यहीं नाटकों का मंचन होता था, कवि सम्मेलन की गूंज उठती थी, सरकारी और सामाजिक कार्यक्रमों की रौनक दिखती थी. क्षेत्रीय प्राधिकरण द्वारा 1975 में निर्मित इस भवन का उद्घाटन 2 अक्टूबर 1977 को तत्कालीन बिहार सरकार के मंत्री ललित उरांव ने किया था. उस समय मात्र 11 लाख रुपये की लागत से बने इस हॉल ने दशकों तक रांची की सांस्कृतिक पहचान को संभाले रखा.

लेकिन 2010 के बाद भवन की हालत बिगड़ती गई. दीवारें टूटने लगीं, संरचना कमजोर पड़ गई और 2011 में बिल्डिंग डिवीजन ने इसे कंडम घोषित कर दिया. इसके बाद वर्षों तक योजनाएं बनती रहीं, प्रस्ताव फाइलों में घूमते रहे, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठ सका. रांची को एक नए, सुरक्षित और आधुनिक सांस्कृतिक स्थल की सख्त जरूरत थी.

नए सपने की जमीन—रविंद्र भवन का शिलान्यास

रघुवर दास सरकार के दौरान पुराने टाउन हॉल को पूरी तरह हटाकर आधुनिक रविंद्र भवन बनाने की योजना ने आकार लिया. 3 अप्रैल 2017 का दिन इस यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय साबित हुआ, जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसका शिलान्यास किया.

लेकिन इसके बाद कई मुश्किलें रास्ते में खड़ी हो गईं. 2019 में सरकार बदलने के बाद कई परियोजनाओं पर रोक लगी और निर्माण कार्य लगभग बंद हो गया. फिर 2020 में कोरोना महामारी ने काम को दो साल के लिए पूरी तरह ठप कर दिया. महामारी के बाद बालू की किल्लत, एस्टिमेट रिवाइज और प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने निर्माण को और देर तक रोके रखा.

करीब दो वर्ष पहले काम फिर शुरू हुआ. बाहरी संरचना तैयार हो चुकी थी, लेकिन भीतर की साज-सज्जा और तकनीकी सुविधाओं का काम बाकी था. एस्टिमेट संशोधन के बाद जर्मनी से उच्च गुणवत्ता वाले साउंड सिस्टम, एक्जॉस्ट फैन और अन्य उपकरण मंगाए गए. आज स्थिति यह है कि रविंद्र भवन लगभग पूरा हो चुका है और केवल अंतिम फिनिशिंग शेष है. उद्घाटन की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

रविंद्र भवन महज एक संरचना नहीं, बल्कि झारखंड की कला, साहित्य और परंपरा का जीवंत प्रतीक है. 1500 सीटों वाले विशाल ऑडिटोरियम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार तैयार किया गया है, जहां नाटक, संगीत, नृत्य, सेमिनार और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन सहजता से आयोजित किए जा सकेंगे. मंच की लाइटिंग, ध्वनि और तकनीक को वैश्विक स्तर के अनुरूप डिजाइन किया गया है.

Ravindra Bhawan Ranchi

जर्मनी से मंगाई गई हाई-फिडेलिटी साउंड तकनीक भवन की विशेष पहचान बनने जा रही है. इसकी ध्वनि गुणवत्ता भारतीय सभागारों में कम देखने को मिलती है. आर्ट गैलरी में झारखंड के चित्रकारों, मूर्तिकारों और फोटोग्राफरों को नई पहचान मिलेगी. वहीं विशाल लाइब्रेरी शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए ज्ञान का केंद्र बनेगी. मल्टीपरपज़ हॉल, बैंक्वेट स्पेस, वीआईपी लाउंज, म्यूजिक रूम, रिकॉर्डिंग सुविधा और आधुनिक गेस्ट रूम इसे एक पूर्ण सांस्कृतिक परिसर का रूप देते हैं. डबल बेसमेंट पार्किंग और पर्यावरण-अनुकूल डिजाइन इसे आधुनिकता और जिम्मेदारी दोनों का प्रतीक बनाते हैं.

Ravindra Bhawan Ranchi

रंगकर्मियों, कलाकारों, लेखकों, कवियों और विशेषकर बंगाली समुदाय के लिए यह भवन भावनात्मक महत्व रखता है. रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर बने इस भवन से समाज जुड़ाव महसूस करता है. स्थानीय बुद्धिजीवी और कलाकार इसे रांची की सांस्कृतिक पुनर्जागरण की शुरुआत मान रहे हैं. जर्जर टाउन हॉल के मलबे से उठकर तैयार हुआ यह भव्य, आधुनिक और जीवंत भवन रांची के सांस्कृतिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ने जा रहा है. रविंद्र भवन आने वाले दशकों तक रांची का सांस्कृतिक केंद्र रहेगा.

Ravindra Bhawan Ranchi

यह रचनात्मकता का नया घर होगा, साहित्य और कला का विस्तार करेगा, स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देगा, पर्यटन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा और आने वाली पीढ़ियों को सृजन की नई दिशा देगा.

रांची के सांस्कृतिक भविष्य का नया अध्याय

रांची हमेशा से सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर रहा है, आदिवासी जीवन, लोकगीत, छऊ, सोहराय, पारंपरिक नृत्य यहां की मिट्टी में बसे हैं. लेकिन एक बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक केंद्र का अभाव हमेशा महसूस किया जाता रहा. अब रविंद्र भवन न सिर्फ इस कमी को पूरा करेगा, बल्कि रांची को सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित करेगा.