पेसा नियमावली पर विवाद के बीच क्या झारखंड कांग्रेस 2 खेमों में बंट गई है, क्या बोले प्रदीप यादव...
Ranchi: वर्ष 1996 में संसद से पास "पेसा एक्ट-1996" के झारखंड में क्रियान्वयन को लेकर बनाई गई नियमावली को लेकर राज्य की राजनीति गरमाई हुई है. नियमावली के प्रावधानों को लेकर जहां भाजपा के नेता बेहद आक्रामक है. वहीं अब इस मुद्दे पर कांग्रेस भी दो खेमों में बंटी हुई नजर आती है. पार्टी के अंदर एक ओर जहां डॉ. रामेश्वर उरांव जैसे आदिवासी समुदाय से आनेवाले नेता खुलेआम "झारखंड पेसा नियमावली-2025" को मूल "पेसा कानून-1996" के प्रावधान के उलट बताकर इसका विरोध कर रहे हैं.

दूसरी ओर कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, बंधु तिर्की, प्रदीप बलमुचू जैसे आदिवासी नेता "पेसा नियमावली" को बेहतरीन और अधिसूचित क्षेत्र के जनजातीय समुदाय के लोगों को स्वशासन की दिशा में बड़ा कदम करार दे रहे हैं. पार्टी के अंदर पेसा नियमावली को लेकर बड़े और जनाधार वाले आदिवासी नेताओं के बीच का विरोधाभास कम करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष भी बहुत सोच समझ कर बयान दे रहे हैं.
झारखंड पेसा नियमावली 2025 को लेकर पार्टी के अंदर की गुटबाजी के सवाल पर प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा कि जो व्यक्ति पेड़ चढ़ता है, उसे ही गिरने की संभावना होती है. 1996 में बने कानून को झारखंड में लागू करने की पहल अब तक नही हुई थी. लंबे दिनों तक राज्य में सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा भी नियमावली नहीं बनाई.
केशव महतो कमलेश ने कहा कि पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव का एक्सटेंडेड पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी में उठाये गए मुद्दे विरोधाभाषी थे. जब मीडियाकर्मियों ने डॉ. रामेश्वर उरांव के बयान को अक्षरशः बताया तब उन्होने कहा कि नियमावली में सुधार की गुंजाइश तो रहती ही है. अगर कोई बदलाव की जरूरत होगी तो जरूर सरकार, उस पर विचार जरूर करेगी.
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केशव महतो कमलेश
झारखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा कि पार्टी के अंदर कोई विरोधाभाष नहीं है. लोकतांत्रिक पार्टी में सब अपनी अपनी बात कहते हैं लेकिन पार्टी पूरी तरह एकजुट है.

पूर्व वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव
झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव का मानना है कि 1996 में कांग्रेस की सरकार में जो कानून संसद से बने थे. उसमें ग्रामसभा की ताकत और अधिसूचित क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों की रूढ़िवादी परंपरा को विशेष महत्व दिया गया था. लेकिन नियमावली में ग्रामसभा के चयन में रूढ़िवादी परंपरा को लेकर चलने वाले आदिवासी समुदाय के साथ साथ प्रशासनिक अधिकारी और अन्य को भी शक्ति दे दी गयी है, यह ठीक नहीं है.
झारखंड कांग्रेस की पीएसी की एक्सटेंडेड कमेटी में भी रामेश्वर उरांव ने इस मुद्दे को उठाया था. बाद में मीडिया के समक्ष भी यह कहने ने नहीं चूके कि अगर आदिवासी समुदाय के लोग 'वर्तमान पेसा नियमावली' के विरोध में अदालत जाते हैं तो वह उसका समर्थन करेंगे.







