Ranchi University में एडमिशन लेने से पहले एक बार सबकुछ पता जरूर कर लें वरना डिग्री के साथ-साथ समय का भी हो सकता है नुकसान...
आप यहां से पढ़ाई कर डिग्री लेने जायेंगे, लेकिन आपको डिग्री के नाम पर बूड़बक बना दिया जायेगा. डिग्री में पायेंगे कि आपके नाम में ही गलती है. अगर आपका नाम गुलाब है, तो रांची यूनिवर्सिटी से मिली डिग्री में आपका अपना नाम ROSE दिखायी पड़ेगा. साफ़ है, रांची यूनिवर्सिटी एक क़दम आगे बढ़कर सोंचता है, बिल्कुल अंग्रेज़ी में.
हालांकि, रांची यूनिवर्सिटी की सोंच यहीं तक सीमित नहीं है. अगर आपका नाम सुष्मिता है तो यूनिवर्सिटी आपके नाम को कुछ gibberish में छापकर डिग्री आपको हैंडओवर कर देगा. आपका नाम ही आपकी पहचान है, स्कूल से लेकर सरकारी दस्तावेज़ों, और नागरिक के तौर पर भी आप अपने नाम से ही जाने जाते हैं. आपका नाम ही होता है, जो आपको ऊंचाईंयों तक ले जाता है, आपके किसी जबरे फैन को भी आपका नाम ही याद रहेगा. लेकिन रांची यूनिवर्सिटी आपके नाम की ही धज्जिया उड़ा देता है. कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक, जहां बताया गया है कि रांची यूनिवर्सिटी द्वारा छात्रों को दी जाने वाली डिग्रियों में बड़े पैमाने पर अशुद्धियां हैं. यानि किसी के नाम में ही गलती है, तो किसी में छात्र अपना खुद का नाम नहीं पढ़ पा रहे हैं. कहीं नाम ही बिगाड़ दिया गया है, तो कहीं नाम की जगह डिज़ाइन या अजीबोग़रीब निशान छाप दिये गये हैं. इसके प्रमाण खुद छात्रों ने दिये हैं.
नाम है जयचंद, डिग्री में कर दिया गया ‘जयचा’
उदाहरण के लिये ये सुष्मिता तिरू नाम की छात्रा की डिग्री है, इसमें अंग्रेज़ी में तो नाम सही सही मेंशन है, मगर हिंदी में नाम की जगह क्या लिख दिया गया है, ये बेचारी सुष्मिता भी नहीं पढ़ पा रही है. सुधार के लिये यूनिवर्सिटी मुख्यालय में आवेदन भी दे चुकी हैं, लेकिन सुधार होकर अब नहीं मिला है. इसी तरह विक्रम कुमार चौधरी, जयचंद महतो, दिलीप कुशवाहा के नाम में भी भारी भरकम गड़बड़ी करके डिग्री हैंडओवर कर दी गयी. ऐसे में करियर में दिक्कतें आ सकती हैं, मेडिकल छात्रों को मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन में बाधा आ सकती है. किसी भी संस्थान में डिग्री स्वीकार्य नहीं होगा. यानि कुल मिलाकर, छात्रों का भविष्य अधर में लटक सकता है.
रांची विवि में हिंदी डेटा एंट्री ऑपरेटर अयोग्य?
गौर करें, तो इसमें एक ट्रेंड देखने को मिलेगा. अंग्रेज़ी में तो नाम सही है, लेकिन हिंदी में नाम बिगाड़ दिये जाते हैं. ऐसे में आशंका व्यक्त की जा रही है कि हिंदी डेटा की एंट्री किसी अयोग्य ऑपरेटर से करवाई जा रही है. यूनिकोड या फिर फॉन्ट कन्वर्जन की सही तकनीक नहीं अपनाई जा रही. लेकिन उससे भी बड़ा सवाल लापरवाही का है. विश्वविद्यालय इतना लापरवाह और फांकीबाज़ कैसे हो सकता है कि 5-10 लाइन की डिग्री जैसे महत्वपूर्ण एवं छात्रों का भविष्य तय करने वाले दस्तावेज़ में बोल्ड अक्षरों में मेंशन नाम में ही इतना भारी मिस्टेक हो जाये, और बिना प्रूफ रीड किये या वेरिफाई किये डिग्री को सीधे छात्रों को हस्तांतरित कर दिया जाये. क्या विश्वविद्यालय की ज़िम्मा केवल इतना ही है कि स्टूडेंट्स के हाथों में डिग्री सौंप दिये जायें. कैंपस प्लेसमेंट न सही, बुनियादी सुविधायें न सही, मगर कॉलेज- यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद कम से कम डिग्रियां तो साफ-सुथरी और एरर फ्री मिले. विवि से इतनी अपेक्षा तो छात्र रख ही सकते हैं. सोंचिये, अगर सही ढंग से, और बिल्कुल ईमानदारी पूर्वक सत्यापन किया गया होता, तो छात्रों को बेवजह यूनिवर्सिटी के चक्कर नहीं काटने पड़ते, वे डिग्री हासिल करने के बाद अपने करियर पर फोकस कर पाते. उन्हें विवि के कुव्यवस्था का शिकार न होना पड़ता. मगर शायद विवि को इसकी बिल्कुल भी परवाह नहीं है.







