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सरकारी विभाग का बड़ा खेल: ढाई साल तक गायब कर्मचारी के नाम पर उठता रहा मानदेय! 3 साल बाद भी कार्रवाई नहीं...

सरकारी विभाग में लापरवाही और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है. यहां एक कर्मचारी करीब ढाई साल तक ड्यूटी से गायब रहा, लेकिन उसके नाम पर लगातार मानदेय का भुगतान होता रहा. हैरानी की बात यह है कि मामला सामने आने के करीब तीन साल बाद भी संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकी है. इस पूरे प्रकरण ने विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली और भुगतान व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
 
Jharkhand

Deoghar:  झारखंड के देवघर कॉलेज में जैक फंड से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितता का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब तीन साल बीत जाने के बाद भी इस मामले में विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं होने पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने नाराजगी जताई है। आरोप है कि कॉलेज में कार्यरत जैक कर्मी बालेश्वर मांझी के नाम पर करीब ढाई साल तक लगभग डेढ़ लाख रुपये का मानदेय निकाल लिया गया। इस मामले में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. बसंत कुमार गुप्ता समेत संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे। अब राजभवन ने सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका की कुलपति से जवाब मांगा है और लंबित विभागीय कार्रवाई जल्द पूरी करने का निर्देश दिया है।

तीन साल बाद भी कार्रवाई अधूरी, राजभवन ने जताई नाराजगी

राजभवन के अवर सचिव संजय कुमार ने विश्वविद्यालय की कुलपति को पत्र भेजकर पूरे मामले में जवाब-तलब किया है। पत्र में कहा गया है कि विभागीय कार्रवाई संचालित करने का निर्देश 20 अप्रैल 2023 को ही दिया गया था। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने अब तक न तो कार्रवाई का अंतिम निष्पादन किया है और न ही दोषियों को दिए गए दंड की जानकारी राजभवन को उपलब्ध कराई है।

लोकभवन ने इसे गंभीर प्रशासनिक मामला मानते हुए पूर्व के निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा है। साथ ही तत्कालीन प्राचार्य डॉ. बसंत कुमार गुप्ता सहित संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया गया है।

ढाई साल तक मानदेय निकासी का मामला

पूरा मामला देवघर कॉलेज में कार्यरत जैक कर्मी बालेश्वर मांझी के मानदेय भुगतान से जुड़ा है। आरोप है कि करीब ढाई साल तक उनके नाम पर लगभग डेढ़ लाख रुपये का मानदेय निकाला गया। इस कथित वित्तीय अनियमितता को लेकर कॉलेज प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठे थे।

फरवरी 2023 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने इस मामले को लेकर कॉलेज परिसर में धरना-प्रदर्शन किया था। परिषद ने तत्कालीन प्राचार्य डॉ. बसंत कुमार गुप्ता, लेखापाल, बर्सर और अन्य संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच कराने के साथ उनके निलंबन की मांग की थी। परिषद का आरोप था कि केवल प्राचार्य का स्थानांतरण कर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। इसके बाद मामला राजभवन तक पहुंचा।

सिंडिकेट के दो फैसलों में बदलाव पर भी सवाल

इस मामले में विश्वविद्यालय सिंडिकेट की कार्यप्रणाली भी राजभवन के निशाने पर है। 28 जून 2025 और 26 सितंबर 2025 को हुई सिंडिकेट की बैठकों में लिए गए फैसलों में बदलाव को लेकर कुलपति से स्पष्टीकरण मांगा गया है।

जानकारी के मुताबिक, 28 जून 2025 की बैठक में तत्कालीन प्राचार्य और अन्य संबंधित लोगों को निलंबित करने के साथ प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्णय लिया गया था। लेकिन 26 सितंबर 2025 की बैठक में पूरे मामले की दोबारा समीक्षा करने का फैसला लिया गया।

अब राजभवन ने पूछा है कि पहले लिए गए निर्णय में किन परिस्थितियों में बदलाव किया गया और इसके पीछे क्या आधार था। विश्वविद्यालय को दोनों बैठकों के फैसलों में हुए बदलाव का कारण स्पष्ट करना होगा।

जिस प्राचार्य पर आरोप, उन्हें ही बनाया गया सिंडिकेट सदस्य

इस पूरे प्रकरण में एक और बात चर्चा में है। तत्कालीन प्राचार्य डॉ. बसंत कुमार गुप्ता, जिनकी भूमिका को लेकर वित्तीय अनियमितता के मामले में सवाल उठे थे, उन्हें वर्तमान में विश्वविद्यालय सिंडिकेट का सदस्य भी मनोनीत किया गया है।

इस पर भी राजभवन ने विश्वविद्यालय से जानकारी मांगी है। लंबे समय से लंबित कार्रवाई के बीच संबंधित प्राचार्य को सिंडिकेट में शामिल किए जाने से मामला और संवेदनशील हो गया है।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या दिया तर्क?

दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि संबंधित प्राचार्य ने कथित वित्तीय अनियमितता से जुड़ी पूरी राशि वापस कर दी है। उनका स्थानांतरण भी किया जा चुका है। हालांकि, राजभवन का जोर केवल राशि की वापसी या स्थानांतरण पर नहीं, बल्कि पूरे मामले में विभागीय कार्रवाई के अंतिम निष्पादन और जिम्मेदारी तय करने पर है।

अब सबकी नजर विश्वविद्यालय की ओर से दिए जाने वाले जवाब और राजभवन के निर्देशों पर होने वाली अगली कार्रवाई पर है।