भाजपा में बदले अध्यक्ष, बाकी दलों में वही चेहरे: देश की राजनीति में कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते पार्टी प्रमुख?
Political news: भारतीय जनता पार्टी में नितिन नवीन के अध्यक्ष बनते ही एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। अब भाजपा के पास ऐसे सात पूर्व अध्यक्ष हैं, जो आज भी जीवित हैं। इनमें से कुछ नेता उम्र के कारण राजनीति से लगभग दूर हो चुके हैं, जबकि कुछ आज भी केंद्र सरकार में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की उम्र 90 साल से अधिक हो चुकी है और उनकी राजनीतिक सक्रियता काफी कम हो गई है। पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू अब पार्टी की सीधी राजनीति से दूर हैं, हालांकि वे सामाजिक और सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। वहीं राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और जेपी नड्डा ऐसे पूर्व अध्यक्ष हैं, जो आज भी पूरी तरह सक्रिय हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं।
भाजपा के चार पूर्व अध्यक्ष – अटल बिहारी वाजपेयी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण और जना कृष्णमूर्ति – अब इस दुनिया में नहीं हैं।
देश में कितनी पार्टियां, कितने अध्यक्ष
भारतीय निर्वाचन आयोग के अनुसार इस समय देश में 6 राष्ट्रीय दल, 33 प्रांतीय दल और 2000 से ज्यादा गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन 39 राष्ट्रीय और प्रांतीय दलों में भाजपा और कांग्रेस को छोड़ दें, तो ज्यादातर दलों में अध्यक्ष या पार्टी प्रमुख वर्षों तक नहीं बदलते। कई जगह चुनाव जरूर होते हैं, लेकिन असल में पार्टी की कमान एक ही नेता या परिवार के हाथ में रहती है।
कांग्रेस और जेडीयू में भी पुराने चेहरे
भाजपा के बाद कांग्रेस दूसरी बड़ी पार्टी है, जहां दो पूर्व अध्यक्ष आज भी सक्रिय हैं – सोनिया गांधी और राहुल गांधी। इन्हीं के समर्थन से मल्लिकार्जुन खरगे वर्तमान में पार्टी अध्यक्ष हैं।
नीतीश कुमार की जेडीयू में भी पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह और आरसीपी सिंह सक्रिय हैं। आरसीपी सिंह कुछ समय के लिए दूसरी पार्टी में गए थे, लेकिन अब फिर जेडीयू में वापसी की कोशिश कर रहे हैं।
कम्युनिस्ट दलों में भी नेतृत्व लंबे समय तक एक ही चेहरे के पास रहता है। सीपीएम के पूर्व महासचिव प्रकाश करात अभी भी सक्रिय हैं, जबकि सीपीआई के महासचिव डी राजा पिछले कई सालों से पार्टी संभाल रहे हैं।
परिवार के हाथ में पार्टी की कमान
कई दलों में नेतृत्व सीधे परिवार के भीतर चलता है। बिहार में जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ की कमान अब उनके बेटे संतोष सुमन के पास है। मांझी खुद इसके पहले अध्यक्ष थे।
राजद में लालू प्रसाद यादव करीब 28 साल से अध्यक्ष हैं। पासवान परिवार में भी पार्टी की कमान पहले रामविलास पासवान, फिर उनके बेटे चिराग और भाई पशुपति पारस के हाथ में चली गई।
उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपनी बनाई पार्टियों में हमेशा खुद ही अध्यक्ष बने रहना पसंद किया। अब उनकी पत्नी, बेटे और बहू भी राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं।
राष्ट्रीय दलों में भी वही चेहरे
बहुजन समाज पार्टी में मायावती पिछले 22 साल से अध्यक्ष हैं। आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल शुरू से संयोजक बने हुए हैं। नेशनल पीपुल्स पार्टी में पीए संगमा के बाद उनके बेटे कॉनराड संगमा अध्यक्ष हैं।
प्रांतीय दलों में भी लंबे समय से वही नेता
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और तमिलनाडु में एमके स्टालिन लंबे समय से अपनी-अपनी पार्टियों के प्रमुख हैं।
कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा 26 साल से जेडीएस के अध्यक्ष हैं। ओडिशा में नवीन पटनायक 28 साल से बीजेडी की कमान संभाले हुए हैं। तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और झारखंड में हेमंत सोरेन भी पार्टी प्रमुख के तौर पर वर्षों से बने हुए हैं।
बदलते हैं चेहरे, नहीं बदलती कुर्सी
कुल मिलाकर देखा जाए तो देश की राजनीति में भाजपा एक ऐसी बड़ी पार्टी है, जहां समय-समय पर अध्यक्ष बदले जाते हैं और पुराने अध्यक्ष भी अलग-अलग जिम्मेदारियों में आगे बढ़ते हैं। लेकिन बाकी ज्यादातर दलों में कुर्सी लंबे समय तक एक ही नेता या परिवार के पास रहती है। यही वजह है कि भारतीय राजनीति में नेतृत्व बदलने की परंपरा अब भी बहुत सीमित दिखाई देती है।







