सीजीएल परीक्षा पेपर लीक मामला: सत्यवत इंफोसोल की रिव्यू याचिका नामंजूर, तीन साल की ब्लैकलिस्टिंग बरकरार...
Ranchi: रांची झारखंड हाईकोर्ट ने सत्यवत इंफोसोल प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दाखिल सिविल रिव्यू याचिका को दूसरी बार खारिज कर दिया है. कंपनी ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) द्वारा ब्लैकलिस्ट किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने इसे बरकरार रखा.
इससे पहले भी कंपनी की रिट याचिका और पहली सिविल रिव्यू याचिका हाईकोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी थी. इसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां से उसे राहत नहीं मिली और पुनः हाईकोर्ट में रिव्यू दायर करने को कहा गया. इसी क्रम में दाखिल दूसरी रिव्यू याचिका पर हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए इसे भी खारिज कर दिया. न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की.
दरअसल, जेएसएससी ने सीजीएल परीक्षा में पेपर लीक के मामले में कंपनी को 25 अप्रैल 2024 के आदेश के तहत तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया था. हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि कंपनी संतोषजनक जवाब देने में विफल रही, इसलिए आयोग की कार्रवाई उचित है. कंपनी पर लगाया गया प्रतिबंध यथावत रहेगा.
जेपीएससी सिविल सेवा बैकलॉग परीक्षा 2026 की अधिकतम आयु सीमा को चुनौती देने वाली याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने मामले में झारखंड लोक सेवा आयोग और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है.
अगली सुनवाई 21 अप्रैल को निर्धारित की गई है. याचिकाकर्ता अमित कुमार एवं अन्य की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने कोर्ट को बताया कि बैकलॉग परीक्षाएं वर्ष 2021 (विज्ञापन संख्या 5/2026) और वर्ष 2024 (विज्ञापन संख्या 6/2026) से संबंधित हैं. ऐसे में इन परीक्षाओं के लिए अधिकतम आयु सीमा का निर्धारण भी संबंधित वर्षों के आधार पर होना चाहिए. कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार ने विज्ञापन संख्या 5/2026 के लिए अधिकतम आयु सीमा 1 अगस्त 2022 और विज्ञापन संख्या 6/2026 के लिए 1 अगस्त 2017 तय की है.
जबकि वर्ष 2021 की नियमित परीक्षा के लिए कट-ऑफ डेट 1 अगस्त 2016 और वर्ष 2024 की परीक्षा के लिए 1 अगस्त 2017 थी. अधिवक्ता ने दलील दी कि बैकलॉग परीक्षा, नियमित परीक्षा का ही हिस्सा होती है, इसलिए उसमें भी वही कट-ऑफ डेट लागू होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि 22 फरवरी 2026 को जारी सरकारी अधिसूचना, जिसमें आयु सीमा 1 अगस्त 2022 निर्धारित की गई है, उसे पिछली बैकलॉग परीक्षाओं पर लागू नहीं किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि दोनों बैकलॉग परीक्षाओं के लिए अधिकतम आयु सीमा वर्ष 2018 निर्धारित की जाए.
उल्लेखनीय है कि इन बैकलॉग परीक्षाओं के माध्यम से कुल 52 पदों को भरा जाना है. जेपीएससी बैकलॉग परीक्षा 2026 की उम्र सीमा को चुनौती, हाईकोर्ट ने सरकार व आयोग से मांगा जवाब रांची. झारखंड में मादक पदार्थों के बढ़ते अवैध कारोबार पर झारखंड हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए सरकार और केंद्रीय एजेंसियों को कड़े कदम उठाने का निर्देश दिया है.
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने ड्रग्स की रोकथाम, जब्ती और अनुसंधान को लेकर पेश दो एसओपी का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार और केंद्रीय एजेंसियां मिलकर ड्रग्स कंट्रोल पर काम करें. साथ ही स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता अभियान चलाने के लिए वर्कशॉप आयोजित करने को कहा, ताकि युवाओं को नशे से बचाया जा सके.
सरकार की ओर से प्रस्तुत एसओपी में एक में ड्रग्स से जुड़े मामलों के अनुसंधान की प्रक्रिया, जबकि दूसरे में सर्च ऑपरेशन, जब्ती और मादक पदार्थों की खेती नष्ट करने के उपाय शामिल हैं. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल छोटे स्तर के ड्रग्स विक्रेताओं को पकड़ने से समस्या खत्म नहीं होगी. बड़े तस्करों और ड्रग सिंडिकेट पर कार्रवाई जरूरी है. कोर्ट ने मनी ट्रेल की जांच और नेटवर्क को उजागर करने पर भी जोर दिया। निर्देशों के साथ ही झारखंड हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका का निष्पादन कर दिया.
रांची में कैट का स्थायी बेंच स्थापित करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. याचिकाकर्ता प्रदीप कुमार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि फिलहाल कैट का स्थायी बेंच पटना में है, जबकि रांची में केवल सर्किट बेंच संचालित हो रहा है. मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने प्रार्थी के पक्ष को सुना और उनसे यह स्पष्ट करने को कहा कि रांची में स्थायी बेंच स्थापित करना क्यों आवश्यक है.
इस पर प्रार्थी की ओर से दलील दी गई कि केंद्रीय कर्मचारियों के सेवा विवाद से जुड़े 800 से अधिक मामले लंबित हैं। यदि रांची में स्थायी बेंच स्थापित होता है, तो इन मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और संबंधित कर्मचारियों को राहत मिलेगी. कोर्ट ने मामले में विस्तृत सुनवाई के लिए 23 अप्रैल की तिथि निर्धारित की है. मामले की सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की बातों को गंभीरता से सुना गया. रांची झारखंड हाईकोर्ट ने बुंडू सब-डिविजन कोर्ट को सिविल कोर्ट के रूप में विकसित करने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है.
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि सुविधा बढ़ाने में देरी और आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराना लाल फीताशाही का उदाहरण है. सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि हाईकोर्ट के निर्देश पर मुख्य सचिव ने एक कमेटी गठित की थी.
कमेटी ने पाया कि कोर्ट की आधारभूत संरचना की योजना 16-17 साल पुरानी है और इसे अपडेट करना जरूरी है. इस पर विधि विभाग से राय मांगी गई, जिसने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से आवश्यक संसाधनों की जानकारी मांगी. रजिस्ट्रार जनरल ने यह जानकारी रांची के जुडीशियल कमिश्नर से मांगी, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला. अपर महाधिवक्ता आशुतोष आनंद ने कोर्ट को बताया कि इसी कारण बैठक बेनतीजा रही। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में मुख्य सचिव, रांची डीसी, लॉ सेक्रेट्री, रजिस्ट्रार जनरल और जुडीशियल कमिश्नर समेत सभी संबंधित अधिकारी उपस्थित रहें.







