राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान सांसद दीपक प्रकाश ने कहा, उरांव और संथाल जनजाति की संस्कृति प्राचीनतम है. इनके धरोहरों को संरक्षित किया जाना चाहिए...
New Delhi/Ranchi: संसद में राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने कहा कि उरांव और संथाल जनजाति की संस्कृति प्राचीनतम है. इनके धरोहरों को संरक्षित किया जाना चाहिए.
Feb 10, 2026, 11:45 IST
New Delhi/Ranchi: झारखंड की संथाल और उरांव जनजाति की अपनी एक अलग पहचान है. अब उनकी अस्मिता की आवाज दिल्ली तक पहुंच गई है. झारखंड से भाजपा के राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने दोनों जनजातियों के धरोहरों को संरक्षित करने का मुद्दा संसद में उठाया है. उन्होंने एक सांस्कृतिक कॉरिडोर विकसित करने की मांग की है.
संसद में राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने कहा कि उरांव और संथाल जनजाति की संस्कृति प्राचीनतम है. इनके धरोहरों को संरक्षित किया जाना चाहिए.
उन्होंने सरकार से मांग की कि झारखंड और बिहार की सीमाओं में फैले ऐतिहासिक स्थलों रोहतासगढ़, मुड़मा और मरांग बुरु को जोड़कर एक 'विशिष्ट सांस्कृतिक कॉरिडोर' विकसित किया जाए.
राज्सभा सांसद दीपक प्रकाश ने कहा कि आदिवासियों को संरक्षित करने के लिए उनकी विरासत को सहेजना होगा. उन्होंने काव्य पंक्तियों के जरिए आदिवासियों के गौरव का बखान किया. कहा कि "जहां पुरखों की खुशबू है, जहां आस्था का डेरा है, वो रोहतासगढ़, वो मुड़मा, वो मारंग बुरु, पहचान का सवेरा है."
उन्होंने जोर देकर कहा कि बिहार का रोहतासगढ़ उरांव समाज के शौर्य और उनके पूर्वजों की अमिट स्मृतियों का केंद्र है.
वहीं, रांची के मांडर में मौजूद 'मुड़मा स्थल' न केवल धार्मिक शक्ति खूंटा का प्रतीक है, बल्कि यह उस 'पड़हा शासन व्यवस्था' की जननी है, जिसने आदिवासी समाज को सदियों से एक सूत्र में पिरोए रखा है.
उन्होंने कहा कि पारसनाथ में मौजूद 'मरांग बुरु' संथाल आदिवासियों से सर्वोच्च देवता है. यह केवल एक पर्वत नहीं बल्कि आदिवासियों के अस्तित्व की पहचान है. उन्होंने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर की धरोहरें आज भी सड़क, बिजली, पेयजल जैसे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहीं हैं.
राज्यसभा सांसद ने सरकार से आग्रह किया है कि मुड़मा, मरांगबुरू और रोहतासगढ़ को जोड़कर एक विशिष्ट कॉरिडोर का निर्माण किया जाय ताकि देश ही नहीं बल्कि दुनिया भी भारत की आदिवासी सभ्यता, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से रूबरू हो सके.







