झारखंड में राज्यसभा सीट पर सस्पेंस, भूपेश बघेल की परीक्षा और हेमंत सोरेन की रणनीति ने बदला पूरा खेल!
Ranchi: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों को लेकर महागठबंधन में खींचतान तेज हो गई है. कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के तौर पर प्रणव झा को मैदान में उतार दिया है, लेकिन इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने दोनों सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं. इससे कांग्रेस के पर्यवेक्षक और वरिष्ठ नेता Bhupesh Baghel के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि गठबंधन धर्म के तहत उसे एक सीट मिले, जबकि मुख्यमंत्री Hemant Soren की पार्टी JMM दोनों सीटों पर अपना दावा मजबूत कर रही है। पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन का अधिकार भी हेमंत सोरेन को दे दिया है,
दरअसल, कांग्रेस आलाकमान, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बेहद करीबी माने जाने वाले प्रणव झा को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है. लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के मुखिया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक ऐसा राजनीतिक दांव चल दिया है, जिससे कांग्रेस खेमे में हड़कंप मच गया है. इस संभावित ‘खेला’ को रोकने और अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को विशेष ऑब्जर्वर बनाकर रांची भेजने का फैसला किया है.

हेमंत सोरेन ने कैसे किया ‘खेल’?
दरअसल, झारखंड विधानसभा में विधायकों की संख्या के गणित के हिसाब से गठबंधन आसानी से दो राज्यसभा सीटें जीत सकता है. तय फॉर्मूले के मुताबिक एक सीट झामुमो और दूसरी सीट कांग्रेस के खाते में जानी थी. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की हेमंत सोरेन के साथ दिल्ली में हुई बैठक के बाद ही प्रणव झा के नाम का ऐलान हुआ था. लेकिन 5 जून को रांची में झामुमो विधायकों और मंत्रियों की बैठक में अचानक सुर बदल गए. झामुमो के विधायकों ने पुरजोर मांग रख दी कि पार्टी दोनों राज्यसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. हेमंत सोरेन को इस पर अंतिम फैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया गया है, जिससे कांग्रेस उम्मीदवार की जीत पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. खास बात यह बताया जाता है कि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को प्रियंका गांधी के करीबी हैं, जिससे चुनाव का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है.

प्रियंका गांधी के दोस्त प्रणव झा के लिए साख की लड़ाई
झारखंड से आने वाले प्रणव झा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) में सचिव हैं और उन्हें प्रियंका गांधी वाड्रा का बेहद भरोसेमंद रणनीतिकार माना जाता है. दिल्ली दरबार में मजबूत पकड़ रखने वाले प्रणव झा के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है. झामुमो के इस कड़े रुख के बाद कांग्रेस के भीतर यह डर बैठ गया है कि अगर झामुमो ने दूसरा उम्मीदवार उतार दिया, तो संख्याबल की दृष्टि से कांग्रेस प्रत्याशी की हार तय है.

संकटमोचक बनकर आ रहे हैं भूपेश बघेल
दूसरी ओर, गठबंधन के भीतर मचे इस घमासान को शांत करने और झामुमो को मनाने की जिम्मेदारी कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के कद्दावर नेता भूपेश बघेल और अजय शर्मा को सौंपी है. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने दोनों को तत्काल प्रभाव से झारखंड का ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिया है. भूपेश बघेल को राजनीति का मझा हुआ खिलाड़ी माना जाता है, और उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दूसरा उम्मीदवार उतारने से रोकें और कांग्रेस विधायकों के भीतर किसी भी संभावित क्रॉस-वोटिंग की आशंका को खत्म करें.

क्या होगा हेमंत सोरेन का अगला कदम?
राजनीति के जानकारों का मानना है कि हेमंत सोरेन 8 जून तक इस पर अपना अंतिम फैसला ले सकते हैं. ऐसे में झामुमो का यह कदम कांग्रेस पर आगामी राजनीतिक फैसलों और राज्य के भीतर अपनी पकड़ को और मजबूत करने के दबाव के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में बदली राजनीति के बीच असल सवाल यह नहीं है कि भूपेश बघेल किसी उम्मीदवार को जिता पाएंगे या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और झामुमो राज्यसभा चुनाव में सीट बंटवारे पर सहमति बना पाएंगे.

अब नजरें टिकीं भूपेश बघेल पर
बहरहाल, यदि जेएमएम वास्तव में दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, तो यह महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन का बड़ा संदेश माना जाएगा. वहीं यदि अंतिम समय में समझौता हो जाता है, तो यह कांग्रेस नेतृत्व और बघेल की राजनीतिक बातचीत की सफलता मानी जाएगी. अब पूरी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भूपेश बघेल रांची पहुंचकर हेमंत सोरेन को मनाने में कामयाब होते हैं या फिर झारखंड में इंडिया गठबंधन के बीच की यह दरार और गहरी हो जाएगी.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है क्या भूपेश बघेल कांग्रेस उम्मीदवार को जीत दिला पाएंगे, या हेमंत सोरेन की रणनीति महागठबंधन के भीतर नया राजनीतिक संकट खड़ा कर देगी?फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भूपेश बघेल कांग्रेस उम्मीदवार को जीत दिला पाएंगे, या हेमंत सोरेन की रणनीति महागठबंधन के भीतर नया राजनीतिक संकट खड़ा कर देगी?







