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Jharkhand News: मोरहाबादी की 4.46 एकड़ सेना भूमि पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 15 साल पुराना आदेश रद्द

 
मोरहाबादी की 4.46 एकड़ सेना भूमि पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 15 साल पुराना आदेश रद्द

Ranchi, Jharkhand News: झारखंड हाईकोर्ट ने मोरहाबादी इलाके में सेना के कब्जे वाली 4.46 एकड़ जमीन को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट की खंडपीठ ने उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सेना को यह जमीन मूल दावेदार को लौटाने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की पीठ ने स्पष्ट कहा कि इस मामले में जमीन के मालिकाना हक और उत्तराधिकार को लेकर गंभीर विवाद हैं। ऐसे विवादों का निपटारा हाईकोर्ट में रिट याचिका के जरिए नहीं, बल्कि सिविल कोर्ट में होना चाहिए।

15 साल पुराना आदेश हुआ निरस्त

यह जमीन वर्ष 1946 से सेना के कब्जे में है। पहले इसके मालिक बी.एम. लक्ष्मण राव थे। बाद में उनके बेटे बी.एम. मुकुंद राव को यह जमीन मिली। मुकुंद राव की 1998 में बिना वसीयत के मृत्यु हो गई थी।

इसके बाद जयंत कर्नाड ने खुद को मुकुंद राव की बहन मालती राव कर्नाड का बेटा बताते हुए जमीन का एकमात्र उत्तराधिकारी होने का दावा किया। उन्होंने वर्ष 2007 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सेना से जमीन खाली कराने और बकाया किराया देने की मांग की थी।

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 2009 में याचिका स्वीकार कर सेना को जमीन लौटाने का आदेश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ रक्षा मंत्रालय के स्टेट अफसर ने खंडपीठ में अपील की थी।

सेना और ईडी की दलीलें मजबूत

सेना की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल प्रशांत पल्लव और कुमार वैभव ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि वह जमीन के मूल मालिक का वैध वारिस है। सेना ने यह भी कहा कि जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी, बल्कि किराए पर ली गई थी और समय-समय पर किराया दिया गया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोर्ट को जानकारी दी कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए जमीन से जुड़े दस्तावेज जांच में फर्जी पाए गए हैं। फॉरेंसिक जांच में भी दस्तावेजों से छेड़छाड़ की पुष्टि हुई है।

ईडी जांच में चौंकाने वाले खुलासे

ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि जयंत कर्नाड ने 2019 में इसी जमीन को 13 लोगों को बेच दिया था, जबकि जमीन उस समय भी सेना के कब्जे में थी। इस मामले में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत जांच शुरू कर दी है।

हाईकोर्ट की साफ टिप्पणी

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि जब जमीन के स्वामित्व और उत्तराधिकार को लेकर गंभीर तथ्यात्मक विवाद हों, तो ऐसे मामलों को रिट याचिका के माध्यम से तय नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर एकल पीठ का आदेश रद्द कर दिया गया।