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झारखंड: सारंडा में नक्सल खेमे में टूट, एक करोड़ का इनामी नक्सली एक्टिव, सरेंडर की अटकलें तेज

Ranchi: सुरक्षाबलों की घेराबंदी के कारण वे लगतार रनिंग कैंपों के जरिए जंगलों में भटक रहे हैं. जंगल में पूर्व से लगे करीब 400 से ज्यादा आईईडी बमों को सुरक्षबलों के द्वारा लगातार नष्ट किया जा रहा है. अब तक इन्ही बमों की वजह से 45 से 50 की संख्या में नक्सली सारंडा में अपने आपको सेफ रखे हुए थे. लेकिन अब ये घेराबंदी भी तबाह होने के कगार पर है. ऐसे में बड़े नक्सलियों से लेकर छोटे कैडर तक खौफ में हैं. वे जानते हैं कि अब बहुत ज्यादा दिन तक हथियार के बल पर संघर्ष करना मुश्किल है.
 
 
Naxalites-over-surrender-in-saranda-of-jharkhand

Ranchi: झारखंड में सारंडा के रेड कॉरिडोर में हलचल मची हुई है. जंगल में पिछले दो साल से सुरक्षाबलों की घेराबंदी और अपने सबसे बड़े नेता स्वर्गीय किशन दा के पत्र के बाद नक्सली कैडरों में हथियार डालने के लिए खलबली मची हुई है. वहीं सुरक्षाबल जंगल में लगातार अपनी दबिश बढ़ा रहे हैं. संगठन का सबसे बड़ा नाम इनामी मिसिर बेसरा कभी भी सरेंडर कर सकता है.

हताश नक्सली, आईईडी बमों के सहारे!

पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र के बाद छतीसगढ़ से नक्सलियों के पूर्ण सफाए के बाद जनवरी महीने में एक साथ 17 नक्सलियों के एनकाउंटर के बाद झारखंड के सारंडा में डेरा डाले डाले नक्सली हताश हो चुके हैं. पिछले तीन महीने से सारंडा में नक्सलियों की चहलकदमी बंद पड़ी हुई है.

सुरक्षाबलों की घेराबंदी के कारण वे लगतार रनिंग कैंपों के जरिए जंगलों में भटक रहे हैं. जंगल में पूर्व से लगे करीब 400 से ज्यादा आईईडी बमों को सुरक्षबलों के द्वारा लगातार नष्ट किया जा रहा है. अब तक इन्ही बमों की वजह से 45 से 50 की संख्या में नक्सली सारंडा में अपने आपको सेफ रखे हुए थे. लेकिन अब ये घेराबंदी भी तबाह होने के कगार पर है. ऐसे में बड़े नक्सलियों से लेकर छोटे कैडर तक खौफ में हैं. वे जानते हैं कि अब बहुत ज्यादा दिन तक हथियार के बल पर संघर्ष करना मुश्किल है.

Increased stir among Naxalites regarding surrender in Saranda of Jharkhand

इसी बीच सूचना यह भी है कि सारंडा में झारखंड के लोकल कैडर और बाहरी कैडर के बीच ही आत्मसमर्पण को लेकर तनातनी शुरू हो गई है. झारखंड के नक्सली चाहते हैं कि वे हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट जाएं, हथियार डालने पर कम से कम ओपन जेल में परिवार के साथ रहने का मौका तो मिल जाएगा लेकिन जंगल में तो ऐसा लग रहा है कि पुलिस हर पल उनका पीछा कर रही है.

वहीं दूसरी तरफ राज्य के बाहर के नक्सली (मुख्यतः बंगाल के) वे चाहते हैं कि गुरिल्ला वार के जरिये संघर्ष को जारी रखा जाए. खुफिया रिपोर्ट बताती है कि नक्सलियों के बीच इन बातों को लेकर आपस में विवाद भी हो चुका है, जिसे बड़े नक्सलियों ने समझा बुझाकर शांत करवाया है.

इसी बीच सूचना आई है कि सारंडा के रेड कॉरिडोर का आखिरी सबसे बड़ा चेहरा एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा भी सरेंडर को लेकर भारी दबाव में है. सूचना यह भी है कि मिसिर बेसरा ने अपने आपको संगठन से अलग-थलग कर लिया है. वह भी जंगल से निकल कर आत्मसमर्पण करना चाह रहा है.

क्यों दबाव में है मिसिर बेसरा

वर्तमान समय में मिसिर बेसरा झारखंड के रहने वाला एकमात्र ऐसा नक्सली है जिसपर एक करोड़ का इनाम है. आत्मसमर्पण को लेकर वर्तमान में बेसरा के भारी दबाब में रहने की दो बड़ी वजह है. पहला किशन दा और दूसरा उसका खुद का बेटा. हाल में ही एक नक्सल कैंप से सुरक्षाबलों को दो तरह के लेटर हाथ लगे, पहला पत्र बेसरा के बेटे का था, जिसमें मिसिर के बेटे ने अपने पिता से नक्सल जीवन त्याग कर घर लौटने की मार्मिक अपील की थी.

वहीं दूसरी सबसे बड़ी वजह नक्सलियों के थिंक टैंक मिसिर बेसरा के गुरु किशन दा की वो चिट्ठी जिसे उन्होंने अपनी मौत के 10 दिन पहले लिखी थी. नक्सलियों के थिंक टैंक किशन दा उर्फ प्रशांत बोस ने अपनी मौत से पहले रांची जेल से ही अपने साथियों को पत्र लिखा था.

इस पत्र के जरिए किशन दा ने अपने साथियों को यह बताया था कि वर्तमान समय में सशस्त्र संघर्ष असंभव सा है. ऐसे में उन्होंने इशारों-इशारों में अपने साथियों को आत्मसमर्पण के लिए मन बनाने को कहा था. किशन दा का लिखा आखिरी पत्र सुरक्षा बलों के हाथ लगा है.

कॉमरेड सागर यानी मिसिर बेसरा के नाम से लिखा था पत्र

झारखंड में अपने प्रवास के दौरान नक्सल नेता किशन दा ने सबसे ज्यादा समय पारसनाथ में बिताया. ये इलाका मिसिर का गृह इलाका था. ऐसे में किशन दा को बेसरा से बेहद लगाव था. नक्सल जानकार बताते हैं कि इसी लगाव की वजह से किशन दा ने कॉमरेड सागर को ही पत्र भेजा वो भी अपने मौत के दस दिन पहले.

इस पत्र में किशन दा ने बेसरा को सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने की मौजूदा नीति पर पुनर्विचार की सलाह दी थी. 20 मार्च 2026 को लिखे गए अपने पत्र के जरिए किशन दा ने कॉमरेड सागर को संबोधन किया था. कामरेड सागर यानी एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा.

किशन दा ने लिखा था कि उम्मीद है कि आप तो बड़े दिक्कत के साथ अंदर (यानी जंगल) मे दिन गुजारते होंगे. हिंदी और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हुए किशन दा ने लिखा है यह बात सही है कि मौजूदा डोमेस्टिक सिचुएशन इट्स' वेरी कंपलेक्स एंड वेरी सीरियस इन डिस सिचुएशन. किशन दास के अनुसार हाल के दिनों में संगठन को भारी नुकसान हुआ है जिसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल है.

किशन दा ने संगठन की स्थिति को "बेहद जटिल और गंभीर" करार देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वर्तमान घरेलू परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष (आर्म्स स्ट्रगल) को आगे बढ़ाना लगभग असंभव होता जा रहा है. उन्होंने संगठन को भारी नुकसान का जिक्र किया, जहां हाल के पुलिस अभियानों ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है. पत्र में किशन दा ने सवाल उठाया कि क्या ऐसी परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष को जारी रखना व्यावहारिक और सही कदम होगा?

उन्होंने चेतावनी दी कि बिना हालात का गहन विश्लेषण किए आगे बढ़ना संगठन को और गहरे संकट में धकेल सकता है. यदि मौजूदा रणनीति पर अमल जारी रहा, तो कोई ठोस परिणाम नहीं निकलेगा और हालात और उलझ जाएंगे. किशन दा का ये पत्र बेसरा के लिए एक इशारा है की वो आत्मसमर्पण कर दे

आत्मसमर्पण किया तो बेसरा को मिलेंगे एक करोड़

खुफिया रिपोर्ट बताते हैं कि सारंडा में नक्सलियों की किलेबंदी के ध्वस्त होते और छत्तीसगढ़ से मिलने वाली मदद पूरी तरह से बंद होने के बाद से ही संगठन में आत्मसमर्पण को लेकर विवाद चल रहा है. खासकर जब से यह बात नक्सल में फैली की मिसिर बेसरा खुद आत्मसमर्पण करना चाह रहा ताकि उसे इनाम की राशि जो एक करोड़ है वो उसे मिल जाए. यह सही भी है अगर बेसरा आत्मसमर्पण करता है तो उसे ही एक करोड़ के इनाम की राशि मिलेगी. यह राशि इतनी बड़ी है की उसका और उसके परिवार का पूरा जीवन आराम से गुजरेगा. वहीं अगर वह जंगल मे रहता है तो हालात इतने खराब है कि कभी भी एनकाउंटर में उसकी जान जा सकती है.

अपने-अपने स्तर से अन्य भी जुटे संपर्क में

सारंडा में नक्सली दो गुट में बंटे हुए हैं, एक जो किसी तरह लड़ाई जारी रखना चाहते हैं, दूसरा वे जो अब किसी भी हाल में संगठन से हटना चाहते हैं. आत्मसमर्पण करने वाले किसी भी तरह से पुलिस या फिर आईबी के अफसरों से संपर्क कर सुरक्षा के साथ जंगलों से निकलने की जुगत में हैं.

आईईडी का है खतरा

जिस तरह से सुरक्षा बलों को नक्सलियों के बिल्कुल नजदीक पहुचने ने आईईडी बम बाधा बन रहे हैं. उसी तरह वैसे नक्सल कैडर जो जंगल से बाहर आना चाहते हैं उनके लिए भी जमीन के नीचे बिछाए गए विस्फोटक (आईईडी) का खतरा है. ऐसे में नक्सल कैडर यह चाह रहे हैं कि एक रास्ता उन्हें संगठन के पहल पर ही मिले ताकि वे जंगल से निकल सके.

झारखंड पुलिस मुख्यालय के अनुसार राज्य का करीब 95% हिस्सा नक्सली मुक्त हो चुका है. झारखंड में जो सिर्फ नक्सली बचे हुए हैं वह लगातार अपना ठिकाना बदल रहे हैं और सुरक्षा बल उनके पीछे लगे हुए हैं. जो भी नक्सली बचे हुए हैं वे भारी दबाव में है.

आईजी अभियान डॉ. माइकल राज ने बताया कि कई नक्सली सरेंडर करने के लिए संपर्क कर रहे हैं जल्द ही उनका सरेंडर भी होगा. झारखंड के वर्तमान नक्सल परिदृश्य की बात करे तो सारंडा में एक करोड़ का इनामी नक्सली असीम मंडल उर्फ आकाश , एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर के साथ लगभग 47 नक्सली मौजूद है. पिछले 6 महीने से उनकी कोई गतिविधियां सामने नहीं आई है.

खुफिया विभाग को यह भी सूचना मिली है कि एक करोड़ का इनामी बेसरा कभी भी सरेंडर कर सकता है. वह संगठन छोड़ भूमिगत हो चुका है. हालांकि इस बाबत जब राज्य पुलिस के आईजी अभियान डाक्टर माइकल राज से पूछा गया तो उन्होंने इससे इनकार किया. आईजी अभियान ने इतना जरूर बताया कि पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अफसर बेसरा के परिवार के संपर्क में हैं उसके साथ साथ अन्य नक्सली जो सारंडा ने उनके परिवार वालों से भी संपर्क कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने को कहा गया है.

अभियान तेज, आईईडी किए जा रहे साफ

वहीं दूसरे तरफ सारंडा में बचे नक्सलियों के खिलाफ अभियान भी तेज कर दिया गया है. आईईडी बमों के जाल को साफ और निष्क्रिय कर सुरक्षाबल आगे बढ़ रहे हैं. किसी भी दिन बचे हुए नक्सलियों और पुलिस के बीच भीषण मुठभेड़ हो सकता है. आईजी अभियान माइकल राज ने बताया कि सारंडा में बड़ा अभियान जारी है.

कितने इनामी नक्सली बचे

झारखंड पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार झारखंड में इनामी नक्सलियो की संख्या अभी भी 38 हैं. आंकड़ों के अनुसार झारखंड में वर्तमान समय में 2 करोड़ के दो नक्सली, 25 लाख का एक नक्सली, 15 लाख के आठ नक्सली, 10 लाख के 6 नक्सली, 5 लाख के 12 नक्सली, 2 लाख के तीन नक्सली और एक लाख के तीन नक्सली मौजूद हैं.

झारखंड में नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व पर अभी भी बाहरी राज्यों के नक्सल कमांडरों का वर्चस्व है. पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ के नक्सली नेता झारखंड के नक्सल कैडरों पर हावी हैं. झारखंड के कुछ नक्सली कमांडरों को छोड़ दें तो अधिकांश कैडर और कमांडर का संगठन में कोई पूछ नहीं है.

झारखंड के नक्सली कैडर भी अंदर ही अंदर बाहरी लोगों से खफा हैं. हाल के दिनों में एनकाउंटर में बड़ी संख्या में नक्सलियों के मारे जाने की वजह से भी संगठन में काफी आक्रोश है. बाहरी राज्यों बिहार, छतीसगढ़, बंगाल के कई माओवादी वर्तमान में झारखंड में सक्रिय हैं. राज्य पुलिस के द्वारा जारी की नई इनाम की लिस्ट से भी इस बात की पुष्टि होती है कि झारखंड में बाहरी राज्यों के कमांडरों का वर्चस्व कायम है. बाहरी राज्यों के 21 नक्सली झारखंड में एक लाख से एक करोड़ के इनामी हैं.