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सिर्फ फर्नीचर नहीं, यादों की धरोहर है वह डाइनिंग टेबल- आशा भोसले और धनबाद के शुभेंदु देव की दिल छू लेने वाली कहानी

Legendary singer Asha BhosleMemory: एक दिन की बात है, जब शुभेंदु देव उनके घर पहुंचे. उस दिन राहुल देव बर्मन ने आशा भोसले से कहा कि वे शुभेंदु को मराठी व्यंजन खिलाएं. आशा भोसले प्यार से खाना लेकर आई. उसी दौरान सहज भाव से शुभेंदु देव ने कहा 'आपका डाइनिंग टेबल इतना सुंदर है कि इसे देखकर ही आधा पेट भर गया है'. यह एक साधारण सी बात थी, जो उन्होंने बिना किसी विशेष सोच के बोली थी. लेकिन यह छोटी सी बात आशा भोसले के दिल में बस गई.
 
ASHA BHOSLE

Legendary singer Asha BhosleMemory: भारतीय संगीत जगत की महान गायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रही, लेकिन उनकी यादें, उनके गीत और उनसे जुड़े अनगिनत किस्से आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं. धनबाद के सरायढेला निवासी शुभेंदु देव बर्मन के जीवन में भी उनसे जुड़ी एक ऐसी ही भावनात्मक स्मृति है, जो न केवल उनके व्यक्तित्व की सादगी, बल्कि उनके बड़े दिल की भी झलक दिखाती है.

SINGER ASHA BHOSLE

शुभेंदु देव का परिवारिक संबंध संगीतकार राहुल देव बर्मन और आशा भोसले से रहा है. वे उन्हें चाचा-चाची कहकर संबोधित करते थे. इसी रिश्ते के कारण उनका मुंबई आना-जाना लगा रहता था. 80 के दशक में जब दूरदर्शन पर शनिवार को 45-50 मिनट की लघु फिल्में प्रसारित होती थी, शुभेंदु देव उनमें संगीतकार और म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में भी जुड़े रहे. इसी सिलसिले में उन्हें कई बार मुंबई जाने और अपने चाचा-चाची से मिलने का अवसर मिलता रहा.

डाइनिंग टेबल से जुड़ा है रिश्ता

एक दिन की बात है, जब शुभेंदु देव उनके घर पहुंचे. उस दिन राहुल देव बर्मन ने आशा भोसले से कहा कि वे शुभेंदु को मराठी व्यंजन खिलाएं. आशा भोसले प्यार से खाना लेकर आई. उसी दौरान सहज भाव से शुभेंदु देव ने कहा 'आपका डाइनिंग टेबल इतना सुंदर है कि इसे देखकर ही आधा पेट भर गया है'. यह एक साधारण सी बात थी, जो उन्होंने बिना किसी विशेष सोच के बोली थी. लेकिन यह छोटी सी बात आशा भोसले के दिल में बस गई.

करीब चार साल बाद, जब आशा भोसले कोलकाता आई, तब उन्होंने शुभेंदु देव को खास तौर पर बुलवाया. वे एक होटल में ठहरी हुई थी. शुभेंदु देव उनसे मिलने पहुंचे. मुलाकात के दौरान आशा भोसले ने उन्हें एक पीले रंग का लिफाफा दिया और कहा 'इसमें फोन नंबर है, जहां तुम्हें डाइनिंग टेबल की डिलीवरी लेनी हो, वहां फोन कर देना'. फिर मुस्कुराते हुए बोली 'तुमने कहा था ना कि डाइनिंग टेबल देखकर पेट भर जाता है, इसलिए यह डाइनिंग टेबल तुम्हारे लिए'.

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चार साल बाद शुभेंदु को गिफ्ट की डाइनिंग टेबल

यह सुनकर शुभेंदु देव भावुक हो उठे. उन्होंने कहा कि एक साधारण सी बात को आशा भोसले ने चार वर्षों तक अपने दिल में संजोकर रखा और फिर उसे साकार भी किया. यह उनके बड़े दिल और दूसरों की खुशी के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है. आज भी उनका पूरा परिवार उसी डाइनिंग टेबल पर बैठकर भोजन करता है और हर बार उन्हें आशा भोसले की याद आती है.

आशा भोसले के निधन पर शुभेंदु देव ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह एक युग का अंत है. 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. लेकिन 91 वर्ष की उम्र तक सक्रिय रूप से गीत गाना अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड के समान है. उन्होंने यह भी कहा कि सचिन देव बर्मन के बाद राहुल देव बर्मन ने संगीत जगत में एक नया दौर शुरू किया और उसमें आशा भोसले का योगदान अद्वितीय रहा. वे हर तरह के गीतों को अलग-अलग अंदाज में गाने की अद्भुत क्षमता रखती थी.

शुभेंदु देव के अनुसार इस परिवार ने भारतीय संगीत को जितनी समृद्धि दी है, वैसी सेवा शायद ही किसी और ने की हो. आज जब भी उनका परिवार उस डाइनिंग टेबल पर एक साथ बैठता है, तो केवल भोजन ही नहीं करता, बल्कि उन अनमोल यादों को भी जीता है, जो उन्हें आशा भोसले जैसी महान कलाकार और इंसान से जोड़ती हैं. शुभेंदु के बेटे ने कहा कि यह गर्व की बात है कि इतनी महान गायिका का उपहार हमारे घर में मौजूद है. उनके निधन पर हमें काफी दुख है. अपनी दादी के समान ही उपहार स्वरूप दिए गए इस डाइनिंग टेबल को भी सम्मान देते हैं.

कौन हैं शुभेंदु देव बर्मन

प्रो शुभेंदु देव बर्मन, जिन्होंने शिक्षा, संगीत और अध्यात्म को अपने जीवन का आधार बनाया. उनका जन्म एक विद्वान एवं सांस्कृतिक परिवार में हुआ. उनके पिता प्रख्यात विद्वान संगीतज्ञ प्रो वारिंद्र देव बर्मन उनके जीवन के प्रथम प्रेरणास्रोत रहे. पिता के सान्निध्य में ही उन्हें बचपन से अध्यात्म और संगीत की गहरी समझ मिली. जिसने उनके व्यक्तित्व को नई दिशा दी.

शुभेंदु ने एम कॉम और एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की तथा संगीत के क्षेत्र में भी विशेष दक्षता हासिल की. उनके जीवन में ज्ञान, कला और आध्यात्म का अद्भुत समनवय देखने को मिलता है. वे गीत, नाटक और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में सकारात्मक संदेश फैलाते रहे हैं. आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर अग्रसर रहते हुए उन्होंने मानव कल्याण को अपना उद्देश्य बनाया. वे समाज में नैतिक मूल्यों और चेतना के प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत हैं.