शिक्षकों से प्रशासनिक काम कराने पर सवाल: SIR में ड्यूटी को लेकर शिक्षक संघ का विरोध
Ranchi: SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) कार्य में शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. शिक्षक संघ ने प्रशासन के इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा है कि गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों को लगाए जाने से स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है.
शिक्षक संघ का कहना है कि पहले से ही कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, ऐसे में SIR जैसे कार्यों में ड्यूटी लगाने से कक्षाएं प्रभावित हो रही हैं. कई विद्यालयों में बच्चों को या तो बिना शिक्षक के बैठना पड़ रहा है या फिर पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो रही है.

अभियान के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे. इस कार्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति की जा रही है, जिसका झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ ने विरोध किया है. संघ का कहना है कि पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे सरकारी स्कूलों में इस फैसले से पठन-पाठन बुरी तरह प्रभावित होगा.
झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ ने मांग की है कि शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखा जाए. संघ का कहना है कि शिक्षकों का मूल दायित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन लगातार चुनाव, जनगणना, मतदाता पुनरीक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्यों में उनकी ड्यूटी लगाए जाने से विद्यालयों की नियमित पढ़ाई बाधित हो रही है. इसका सीधा असर विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और परीक्षा परिणाम पर पड़ रहा है.
संघ के प्रदेश महासचिव गंगा प्रसाद यादव ने कहा कि राज्य में पहले ही शिक्षकों की भारी कमी है. इसके बावजूद शिक्षकों को जनगणना और अब एसआईआर जैसे कार्यों में लगाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि विशेष रूप से माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को चुनावी कार्य में लगाए जाने से दसवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होगी. जब परीक्षा परिणाम खराब आते हैं तो शिक्षा विभाग शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि शिक्षकों का काफी समय गैर शैक्षणिक कार्यों में चला जाता है.
30 जून से शुरू होगा SIR
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि 30 जून से शुरू होने वाले एसआईआर अभियान में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाए. उनका कहना है कि यदि शिक्षकों को लगातार ऐसे कार्यों में लगाया जाएगा तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा.
जिला सचिव संजय यादव ने भी कहा कि शिक्षकों से लगातार गैर शैक्षणिक कार्य कराए जा रहे हैं. जनगणना का कार्य अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ है और अब मतदाता पुनरीक्षण अभियान की जिम्मेदारी भी शिक्षकों पर डाली जा रही है. इससे विद्यालयों में नियमित कक्षाएं प्रभावित होंगी और विद्यार्थियों को नुकसान उठाना पड़ेगा.

इधर, चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके लिए पर्याप्त मानव संसाधन की आवश्यकता होती है. राज्य में लगभग 24,520 मतदान केंद्र हैं. जानकारी के अनुसार करीब 50 हजार बीएलओ में पहले से लगभग 7,500 शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि अभियान को सफल बनाने के लिए 25 हजार से अधिक शिक्षकों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं.
अधिकारियों का दावा है कि जिन विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है, वहां पठन-पाठन प्रभावित न हो, इसके लिए आवश्यक व्यवस्था की जाएगी. राष्ट्रीय छात्र-शिक्षक अनुपात के आंकड़े भी राज्य की चुनौती को सामने रखते हैं. झारखंड में औसतन 36 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 24 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का है. ऐसे में शिक्षक संगठनों का तर्क है कि जब राज्य पहले से शिक्षक संकट से जूझ रहा है, तब उपलब्ध शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाना शिक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालेगा.
30 जून से शुरू होने वाले एसआईआर अभियान के तहत मतदाताओं का घर-घर सत्यापन किया जाएगा. इसके बाद 1 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होगी. 4 अगस्त से 1 सितंबर तक दावा एवं आपत्ति दर्ज करने का अवसर मिलेगा और सभी दावों के निपटारे के बाद 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित किए जाने का कार्यक्रम है.
अब देखना होगा कि शिक्षक संगठनों की आपत्तियों के बीच सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है या शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर को देखते हुए कोई वैकल्पिक व्यवस्था करती है. फिलहाल, इस मुद्दे ने शिक्षा और चुनावी व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है.







