Movie prime

धुएं में दम, खाली बर्तन और भूखे बच्चे: देवघर के स्कूलों में गैस संकट ने उजागर की शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई...

Deoghar: गैस संकट के चलते कई स्कूलों में मिड-डे मील अनियमित हो गया है. कभी दाल नहीं बन पाती, तो कभी चावल ही अधपके रह जाते हैं. कुछ स्कूलों में तो हालात ऐसे हैं कि पूरा भोजन ही बंद कर देना पड़ा है. इसका सीधा असर बच्चों की उपस्थिति और पढ़ाई पर दिखने लगा है. शिक्षकों के अनुसार, भूखे बच्चे न तो ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही कक्षा में टिक पाते हैं. कई बच्चे भोजन न मिलने के कारण स्कूल आना ही छोड़ रहे हैं.
 
JHARKHAND

Deoghar: एलपीजी की किल्लत अब सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उन रसोई तक दस्तक दे दी है जहां से बच्चों के भविष्य की थाली सजती है. झारखंड के देवघर में यह संकट अब एक ऐसी तस्वीर बन चुकी है, जिसे देखकर संवेदनशीलता भी शर्मसार हो जाए.

देवघर जिले के ग्रामीण इलाकों में चल रही मध्याह्न भोजन योजना आज अपने ही बोझ तले कराहती नजर आ रही है. बाघमारी गांव के मध्य विद्यालय में रसोई अब गैस के चूल्हे से नहीं, बल्कि धुएं से भरे पारंपरिक चूल्हों से चल रही है और इसी धुएं में घुल रही है रसोइया दीदियों की सेहत और बच्चों की उम्मीदें.

देवघर जिले के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है. रसोई गैस की कमी ने न सिर्फ बच्चों की थाली खाली कर दी है, बल्कि स्कूल परिसरों को धुएं से भरे असुरक्षित स्थान में बदल दिया है. हालात ऐसे हैं कि कहीं लकड़ी और उपलों पर खाना बनाया जा रहा है, तो कहीं गैस पूरी तरह खत्म होने के कारण बच्चों को भूखे ही वापस लौटना पड़ रहा है.  यह स्थिति सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को साफ उजागर करती है. 

गैस खत्म, लकड़ी-उपलों का सहारा

जिले के कई प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में मिड-डे मील के लिए मिलने वाली रसोई गैस महीनों से खत्म पड़ी है. रसोइयों को मजबूरी में लकड़ी, कोयला और उपलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. इससे स्कूल की रसोई ही नहीं, बल्कि कक्षाएं भी धुएं से भर जाती हैं. छोटे-छोटे बच्चे आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत कर रहे हैं. स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि धुएं के कारण कई बार पढ़ाई रोकनी पड़ती है. खासकर निचली कक्षाओं के बच्चे लंबे समय तक धुएं में बैठने में असमर्थ हैं.

करीब 15 वर्षों से बच्चों के लिए भोजन बना रही नूनो देवी अब गैस के अभाव में मजबूरन चूल्हे का सहारा ले रही हैं. लेकिन यह मजबूरी अब बीमारी में बदलती जा रही है. आंखों में जलन, धुंधलापन और डॉक्टर की सख्त सलाह, 'धुएं से दूर रहिए'- उनकी रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है. वहीं दूसरी ओर, बच्चों की थाली तक भी इस संकट की आंच पहुंच चुकी है. जो भोजन कभी दोपहर एक बजे मिल जाता था, अब वह दो से तीन बजे के बीच किसी तरह परोसा जा रहा है. भूख और इंतजार के बीच जूझते ये बच्चे व्यवस्था की सुस्ती का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं.

भूख से पढ़ाई पर असर

गैस संकट के चलते कई स्कूलों में मिड-डे मील अनियमित हो गया है. कभी दाल नहीं बन पाती, तो कभी चावल ही अधपके रह जाते हैं. कुछ स्कूलों में तो हालात ऐसे हैं कि पूरा भोजन ही बंद कर देना पड़ा है. इसका सीधा असर बच्चों की उपस्थिति और पढ़ाई पर दिखने लगा है. शिक्षकों के अनुसार, भूखे बच्चे न तो ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही कक्षा में टिक पाते हैं. कई बच्चे भोजन न मिलने के कारण स्कूल आना ही छोड़ रहे हैं.

रसोइयों की मजबूरी और खतरा

मिड-डे मील बनाने वाली रसोइयों का कहना है कि गैस सिलेंडर के लिए कई बार आवेदन और शिकायत की जा चुकी है, लेकिन आपूर्ति नहीं हो रही. लकड़ी पर खाना बनाते समय जलने का खतरा बना रहता है. पर्याप्त वेंटिलेशन न होने के कारण रसोई में काम करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो गया है.

अभिभावकों में बढ़ता आक्रोश

बच्चों के अभिभावकों में इस स्थिति को लेकर गहरा रोष है. उनका कहना है कि सरकार बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य की बात तो करती है, लेकिन स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. अभिभावकों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द व्यवस्था नहीं सुधरी, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे.

प्रशासन के दावे बनाम हकीकत

प्रशासन की ओर से दावा किया जा रहा है कि गैस आपूर्ति को लेकर प्रक्रिया चल रही है और जल्द समस्या का समाधान कर लिया जाएगा. लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं. स्कूल प्रबंधन का कहना है कि जब तक नियमित गैस आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होती, तब तक मिड-डे मील की गुणवत्ता और बच्चों की सुरक्षा दोनों खतरे में रहेंगी.

सिस्टम पर बड़ा सवाल

देवघर के स्कूलों में गैस संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बच्चों का पोषण और स्वास्थ्य सिर्फ कागजी योजनाओं तक सीमित रह गया है? धुएं में घुटती सांसें और भूख से जूझते बच्चे उस व्यवस्था की सच्चाई बयान कर रहे हैं, जो योजनाओं के बावजूद ज़मीन पर फेल होती दिख रही है. फिलहाल जरूरत है तत्काल और स्थायी समाधान की, ताकि स्कूल बच्चों के लिए शिक्षा और पोषण का सुरक्षित केंद्र बन सकें, न कि धुएं और भूख का अड्डा.