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झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों में लंबे समय से चला आ रहा प्रशासनिक अस्थायित्व अब खत्म होने वाला है, 15 जनवरी से खुलेगा रास्ता...

Ranchi: झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों में लंबे समय से बनी प्रशासनिक अस्थिरता अब खत्म होने की उम्मीद दिखने लगी है. लोकभवन स्तर पर संकेत मिले हैं कि 15 जनवरी 2026 से कुलपति और प्रतिकुलपति की नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया जाएगा. अगर तय समय पर प्रक्रिया पूरी होती है, तो इसी महीने राज्य के कई विश्वविद्यालयों को स्थायी शैक्षणिक नेतृत्व मिल सकता है...
 
JHARKHAND NEWS

Ranchi: झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों में लंबे समय से चला आ रहा प्रशासनिक अस्थायित्व अब खत्म होने की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है. लोकभवन स्तर पर यह संकेत मिले हैं कि 15 जनवरी 2026 से कुलपति और प्रतिकुलपति की नियमित नियुक्ति प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया जाएगा. यदि तय कार्यक्रम के अनुसार प्रक्रिया पूरी होती है, तो इसी माह राज्य के कई विश्वविद्यालयों को स्थायी शैक्षणिक नेतृत्व मिल सकता है.

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राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र में फिलहाल कई अहम पद खाली हैं. रांची विश्वविद्यालय, डीएसपीएमयू, जमशेदपुर वीमेंस यूनिवर्सिटी और पंडित रघुनाथ मुर्मू विश्वविद्यालय ऐसे संस्थान हैं, जहां कुलपति का पद लंबे समय से रिक्त है. वहीं, रांची, कोल्हान, नीलांबर-पीतांबर, विनोबा भावे, सिदो-कान्हू मुर्मू और विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय में प्रतिकुलपति की नियुक्ति का इंतजार किया जा रहा है.

पहले ही पूरी हो चुकी है अहम प्रक्रिया

सभी विश्वविद्यालयों के लिए आवेदन आमंत्रित कर लिए गए थे और योग्य अभ्यर्थियों की प्रारंभिक जांच (स्क्रूटनी) पहले ही पूरी कर ली गई है. अब चयन प्रक्रिया अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है, जिसमें सर्च कमेटी चयनित उम्मीदवारों से संवाद करेगी. इसके बाद नामों का पैनल तैयार किया जाएगा, जिस पर अंतिम निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा. नियमित कुलपति और प्रतिकुलपति की अनुपस्थिति ने विश्वविद्यालयों के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित किया है. कई संस्थानों में अतिरिक्त प्रभार के सहारे प्रशासन चलाया जा रहा है. रांची विश्वविद्यालय और डीएसपीएमयू का दायित्व फिलहाल झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति के पास है. जबकि जमशेदपुर वीमेंस यूनिवर्सिटी की जिम्मेदारी कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलपति निभा रहे हैं. ऐसे में निर्णय प्रक्रिया, अकादमिक योजना और प्रशासनिक स्थिरता प्रभावित हो रही है.

नियुक्ति अधिकार को लेकर बनी हुई है संवैधानिक उलझन

इसी बीच झारखंड सरकार द्वारा लाया गया वह संशोधन विधेयक भी चर्चा में है, जिसमें विश्वविद्यालयों में कुलपति और प्रतिकुलपति की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल की बजाय राज्य सरकार के पास रखने का प्रस्ताव है. यह विधेयक विधानसभा से पारित होकर लोकभवन भेजा जा चुका है. हालांकि, हाल के दिनों में एक अन्य राज्य के इसी तरह के प्रस्ताव को राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद झारखंड के विधेयक को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. फिलहाल उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग से स्पष्टीकरण मांगे गए थे, जिन्हें राजभवन को सौंप दिया गया है. विश्वविद्यालय मंडलों में यह चर्चा भी तेज है कि राज्य के कुछ पूर्व कुलपति और वरिष्ठ विश्वविद्यालय अधिकारी नए सिरे से नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं. माना जा रहा है कि अनुभव को देखते हुए चयन प्रक्रिया में ऐसे नामों को प्राथमिकता मिल सकती है. गौरतलब है कि झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यकाल जुलाई 2026 में समाप्त होने वाला है, जिससे नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया और भी महत्वपूर्ण हो गई है.

शिक्षक संगठनों की चेतावनी

विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने नियुक्तियों में लगातार हो रही देरी को लेकर नाराजगी जाहिर की है. संघ के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार का कहना है कि स्थायी नेतृत्व के अभाव में विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो रहा है. उनके अनुसार, प्रशासनिक फैसले अटक रहे हैं. पठन-पाठन की नियमितता टूट रही है और शैक्षणिक सत्र समय से पीछे चल रहे हैं. शिक्षक संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द निर्णय नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा.

अब निगाहें 15 जनवरी के बाद शुरू होने वाली प्रक्रिया पर टिकी हैं. यदि तय समयसीमा में नियुक्तियां पूरी होती हैं, तो झारखंड के विश्वविद्यालयों को न केवल स्थायी नेतृत्व मिलेगा, बल्कि शिक्षा और प्रशासन दोनों स्तरों पर स्थिरता लौटने की उम्मीद भी जगेगी. लंबे समय से लंबित यह फैसला राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए निर्णायक साबित हो सकता है.