परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों का बड़ा कदम, सभी दलों को बैठक का न्योता
Ranchi: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है. राज्य के विभिन्न आदिवासी संगठनों ने अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों में संभावित कमी की आशंका जताते हुए सर्वदलीय बैठक बुलाने का निर्णय लिया है. इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने और आगे की रणनीति तय करने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को आमंत्रित किया गया है.

आदिवासी संगठनों का कहना है कि यदि परिसीमन के दौरान ST आरक्षित सीटों की संख्या में कमी की जाती है, तो इससे राज्य में आदिवासी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सीधा असर पड़ेगा. संगठनों ने इस विषय को झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है.
सामाजिक कार्यकर्ता अनिल अमिताभ पन्ना के अनुसार, प्रेस क्लब में रविवार को बैठक होगी जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, वर्तमान एवं पूर्व सांसद, विधायक, अधिवक्ता, शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और आदिवासी समाज के प्रतिनिधि भाग लेने वाले हैं. जिसमें वे अपना विचार रखेंगे.
उन्होंने कहा कि परिसीमन से आदिवासी सीटों के घटने की आशंका जताई जा रही है. ऐसे में आदिवासियों का क्या होगा? खासकर, जो झारखंड से इन सीटों पर प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका क्या होगा? इस पर विचार होगा और आगे की रणनीति तय होगी.
झारखंड में वर्तमान विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं 1971 की जनगणना के आधार पर हैं. केंद्र सरकार द्वारा पारित परिसीमन अधिनियम के तहत, झारखंड सहित पूरे देश में सीटों के पुनर्गठन को वर्ष 2026 तक के लिए यथावत रखा गया था. ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि इस साल परिसीमन शुरू होगा.
जाहिर तौर पर झारखंड की वर्तमान विधानसभा की कुल 81 सीटों में बदलाव होंगे. वर्तमान में कुल 81 विधानसभा की सीटों में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) और 9 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं. नये परिसीमन में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटकर लगभग 21 होने की आशंका जताई जा रही है.
इसी तरह लोकसभा की 14 सीटें हैं, जिसमें सामान्य - 8, अनुसूचित जनजाति- 5 और अनुसूचित जाति के लिए 1 सीट आरक्षित हैं. आदिवासी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे राज्य में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जायेगी.
2006 में हुआ था परिसीमन का प्रयास
संवैधानिक रूप से परिसीमन आयोग द्वारा जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है. झारखंड में वर्ष 2006 में परिसीमन लागू करने का प्रयास किया गया था, लेकिन आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भारी कमी आने की आशंकाओं के चलते भारी विरोध हुआ. इसके बाद राष्ट्रपति के विशेष आदेश से 2001 की जनगणना पर आधारित परिसीमन को लागू नहीं किया गया और 2026 तक पुरानी सीमाओं को ही यथावत रखने का निर्णय लिया गया था.
वर्तमान समय में एक बार फिर विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं. आदिवासी संगठनों के साथ साथ सत्तारूढ़ जेएमएम और कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि यदि 2026-2027 के प्रस्तावित परिसीमन को लागू किया जाता है, तो जनसंख्या के बदलते आंकड़ों के कारण झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित लगभग 6 विधानसभा और 1 लोकसभा सीट कम हो सकती है.
परिसीमन को लेकर सियासत
परिसीमन शुरू होने से पहले ही इसपर सियासत शुरू हो गई है. भाजपा ने इसका स्वागत करते हुए इसे एक महज प्रक्रिया बताया है. वहीं सत्तारूढ़ जेएमएम और कांग्रेस इसके विरोध में खुलकर सामने आ गए हैं.
प्रदेश भाजपा प्रवक्ता संदीप वर्मा कहते हैं कि झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या में जिस तरह से गिरावट दर्ज की गई है, वह किसी से छिपी नहीं है. उन्होंने संथाल सहित राज्य के सीमाई क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठ की वजह से हो रहे डेमोग्राफी चेंज पर चिंता जताया और कहा कि सिर्फ वोट की राजनीति नहीं करनी चाहिए बल्कि आदिवासियों के अस्तित्व को भी ध्यान में रखना होगा.
इधर, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) सहित कई अन्य दलों ने परिसीमन का पुरजोर विरोध किया है. जेएमएम के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे ने भाजपा को आदिवासी विरोधी बताया और कहा कि हमलोग इनकी चाल समझते हैं. परिसीमन के जरिए आदिवासी सीटों में कमी लाने की कोशिश का जमकर विरोध होगा.
कांग्रेस के प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने कहा कि इसका विरोध इसलिए हो रहा है कि परिसीमन के जरिए आदिवासी और दलितों की सीटों में कमी की जा रही है. ऐसे में उनके समाज की आवाज कैसे लोकसभा और विधानसभा में उठेगी? उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री यदि इसमें संजीदा हैं तो व्यापकता के साथ इस पर चर्चा कराएं और सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी राजनीतिक दलों की राय लें.
पिछले दिनों आदिवासी छात्र संगठन के बैनर तले प्रतिनिधियों ने राज्यपाल से मिलकर आदिवासी समाज के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों की वर्तमान संरचना को सुरक्षित रखने का आग्रह किया था. प्रतिनिधिमंडल का तर्क यह है कि यदि वर्ष 2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाता है, तो झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों में लगभग 6 सीटें तथा लोकसभा की 1 सीट प्रभावित होगी.







