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रांची में रावण दहन की शुरुआत कब हुई? जब पहली बार बना था 10-12 फीट का रावण का पुतला...

पहली बार आस पास के लोगों ने रावण दहन देखा. रावण दहन के दिन गाजे बाजे, पंजाबी तथा कबायली ढोल नगाड़े के बीच 3-4 सौ लोगों के बीच शाम को रावण में अग्नि प्रज्ज्वलित की गई. यहा एक बात बतानी आवश्यक होगी कि रांची सहित पंजाब के तमाम शहरों में रावण का मुखौटा गधे का होता था, लेकिन 1953 के बाद रावण के पुतले का मुख्य मुखौटा मानव मुख का बनने लगा. 
 
RAVAN DAHAN
Jharkhand Desk: पहली बार आस पास के लोगों ने रावण दहन देखा. रावण दहन के दिन गाजे बाजे, पंजाबी तथा कबायली ढोल नगाड़े के बीच 3-4 सौ लोगों के बीच शाम को रावण में अग्नि प्रज्ज्वलित की गई. यहा एक बात बतानी आवश्यक होगी कि रांची सहित पंजाब के तमाम शहरों में रावण का मुखौटा गधे का होता था, लेकिन 1953 के बाद रावण के पुतले का मुख्य मुखौटा मानव मुख का बनने लगा. 

Jharkhand Desk: रांची में रावण दहन की शुरुआत 1948 में की गई. यह जानकारी देते हुए संदीप नागपाल ने बताया कि आज से 67 वर्ष पूर्व आयोजकों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक छोटा सा आयोजन आज रांची के लोगों के बीच एक विशाल आयोजन का रूप ले लेगा.

Ranchi News - for the first time in 1948 bannu samaj celebrated dussehra by  burning ravana | 1948 में पहली बार बन्नू समाज ने रावण दहन कर दशहरा मनाया |  Dainik Bhaskar

पश्चिमी पाकिस्तान नार्थ वेस्ट फ्रंटियर के कबायली इलाके बन्नु शहर से रिफ्यूजी बन कर राची पधारे 10-12 परिवार ने रावण दहन के रूप में अपना सबसे बड़ा पर्व दशहरा मनाया. एक कसक थी स्व. लाला खिलंदा राम भाटिया को जो बन्नुवाल रिफ्यूजियों के मुखिया थे. तब के डिग्री कालेज (बाद में राची कालेज,मेन रोड डाक घर के सामने) के प्रागण में 12 फीट के रावण का निर्माण स्व.लाला मनोहर लाल नागपाल,स्व. कृष्ण लाल नागपाल, स्व.अमिर चन्द सतीजा,स्व.टहल राम मिनोचा और श्री शादीराम भाटिया एवं स्व.किशन लाल शर्मा के खुद के हाथो द्वारा किया गया.

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रांची में दशहरा दूर्गा पूजा की तरह मनाया जाता था, पहली बार आस पास के लोगों ने रावण दहन देखा. रावण दहन के दिन गाजे बाजे, पंजाबी तथा कबायली ढोल नगाड़े के बीच 3-4 सौ लोगों के बीच शाम को रावण में अग्नि प्रज्ज्वलित की गई. यहा एक बात बतानी आवश्यक होगी कि रांची सहित पंजाब के तमाम शहरों में रावण का मुखौटा गधे का होता था, लेकिन 1953 के बाद रावण के पुतले का मुख्य मुखौटा मानव मुख का बनने लगा. 

दशहरा पर पहली बार कब हुआ था रावण दहन? जानें परंपरा की शुरुआत और महत्व -  when was ravana burnt for the first time on dussehra-mobile

साल 1949 तक रावण के पुतले का निर्माण वहीं मेन रोड स्थित डिग्री कालेज के बरामदे में हुआ. बन्नू वाले समाज ने तब निर्णय लिया कि रावण बनाने में जगह छोटी पड़ती है. पुतला की लंबाई 12 से 20 फीट कर दी गई. उधर 1950 से 1955 तक रावण के पुतले का निर्माण रेलवे स्टेशन स्थित खजुरिया तलाब के पास रेस्ट कैमरा (रिफ्यूजी कैंप) में होने लगा.

रावण के पुतले की लंबाई अब 25 से 35 फीट पहुंच गई. निर्माण का सारा खर्च स्व. मनोहर लाल,स्व. टेहल राम मिनोचा तथा स्व. अमीर चंद सतीजा के द्वारा किया गया. इस बीच लाला खलिदा राम भाटिया का निधन हो गया था. उनके पिताजी स्व. अशोक नागपाल का शौक था, तो उन्हें भी रावण के ढाचे पर लेई लगाकर पुराने अखबार साटने का काम सौंपा गया। यह बताना जरूरी है कि लगभग 10-12 वषरें तक स्व. अशोक नागपाल खुद अपने हाथों से रावण के पुतले का निर्माण किया करते थे.

1950 से लेकर 1955 तक रावण के पुतले का दहन बारी पार्क (शिफटन पेविलियन टाउन हॉल) में होने लगा. यहा भीड़ 25 से 40 हजार तक होती थी. रंगारंग नाच-गान तथा रावण के मुखौटे की पूजा कर रावण दहन होता था. इधर साल दर साल रावण दहन का खर्च बढ़ता गया तथा बन्नू समाज ने इस आयोजन की कमान पंजाबी ¨हदू बिरादरी को सौंप दी. राची में बढ़ती गई दुर्गा पूजा की तरह रावण दहन का क्रेज भी बढ़ गया. 

पंजाबी हिन्दू बिरादरी के लाला देशराज, लाला कश्मीरी लाल, लाला के.एल.खन्ना, लाला धीमान जी, लाला राधाकृष्ण विरमानी, भगवान दास आनन्द, रामस्वरूप शर्मा, मेहता मदन लाल ने जब पंजाबी हिन्दु बिरादरी का कमान संभाली तो ये लोग रावण का निर्माण डोरंडा राम मंदिर में करवाने लगे. रावण दहन के लिए राजभवन के सामने वाले मैदान (नक्षत्र वन) में लगातार 2 सालों तक किया. समय के साथ भीड़ बढ़ने के कारण आयोजकों ने रावण दहन का कार्यक्रम मोरहाबादी में करना मुनासिफ समझा, जो 1960 से आजतक यहीं हो रहा है. पंजाबी हिंदू बिरादरी के आयोजकों ने मेघनाथ तथा कुंभकर्ण के पुतले का भी निर्माण कराया, जो आज तक चल रहा है.