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जहां इंसान ही नहीं, पशुओं को भी मिलती है समाधि! आस्था की अनोखी कहानी...जानिए क्या है मान्यता

Ranchi: अनोखा धाम अपनी अनोखी परंपरा के लिए श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान रखता है. यहां संतों के साथ पशुओं की भी समाधियां बनी हुई हैं. मान्यता है कि संत पशुओं को अपने परिवार का हिस्सा मानते थे. इसी भाव के चलते उनकी स्मृति में पशुओं की समाधियां बनाई गईं. यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु इन समाधियों के सामने भी सिर झुकाते हैं और श्रद्धा प्रकट करते हैं.
 
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Ranchi: महापुरुषों और संतों की समाधियों के बारे में आपने जरूर सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी ऐसी जगह देखी है जहां एक कुत्ते और बिल्ली की समाधि भी श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हो? राजधानी रांची के कोकर स्थित मुक्तेश्वर धाम, जिसे स्थानीय लोग पगला बाबा आश्रम के नाम से जानते हैं, में ऐसा ही अनोखा दृश्य देखने को मिलता है।

Pagla Baba Ashram

यहां भगवान शिव के मंदिर के साथ पगला बाबा के प्रिय कुत्ते ‘भोली’ और एक बिल्ली की समाधि भी मौजूद है। आश्रम से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, कई श्रद्धालु इन समाधियों के सामने भी सिर झुकाकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

कुत्ते ‘भोली’ की समाधि क्यों बनी खास?

Pagla Baba Ashram

मुक्तेश्वर धाम की कई स्थानीय मान्यताएं पगला बाबा से जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि बाबा का जानवरों से बेहद लगाव था। उनके प्रिय कुत्ते ‘भोली’ का आश्रम में काफी समय तक रहना इसी जुड़ाव की कहानी का हिस्सा है।

आश्रम से जुड़ी जानकारी के अनुसार, बाबा जब भोजन करते थे तो पहले भोली को खाना खिलाते थे। बताया जाता है कि बाबा जब किसी धार्मिक यात्रा पर बाहर गए हुए थे, उसी दौरान भोली की मौत हो गई। उसकी मौत की परिस्थितियों को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

बाबा के लौटने पर जब उन्हें भोली की मौत की जानकारी मिली तो वे काफी दुखी हुए। इसके बाद उसकी स्मृति में मुख्य मंदिर के पास समाधि बनाई गई। धीरे-धीरे यह समाधि आश्रम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण और आस्था का केंद्र बन गई।

भैरव से जोड़कर देखते हैं कुछ श्रद्धालु

हिंदू धार्मिक परंपरा में कुत्ते को भगवान भैरव से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से कुछ श्रद्धालु भोली की समाधि को भैरव से जुड़ी आस्था के रूप में देखते हैं।

हालांकि, यह स्थानीय धार्मिक मान्यता है और इसकी ऐतिहासिक पुष्टि अलग विषय है। इसलिए इसे आस्था और स्थानीय परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाता है। कई श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन से पहले भोली की समाधि पर सिर झुकाते हैं।

बिल्ली की समाधि को कहते हैं ‘षष्ठी मां’

मुक्तेश्वर धाम की खासियत सिर्फ भोली की समाधि तक सीमित नहीं है। परिसर में एक बिल्ली की समाधि भी है, जिसे स्थानीय लोग ‘षष्ठी मां’ के नाम से संबोधित करते हैं।

आश्रम से जुड़ी मान्यता के अनुसार, यह बिल्ली भी पगला बाबा और आश्रम से जुड़े लोगों के काफी करीब थी। उसकी मृत्यु के बाद परिसर में समाधि बनाई गई। आज भी कुछ श्रद्धालु यहां पहुंचकर इस समाधि के सामने श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

‘षष्ठी मां’ नाम और इससे जुड़ी कहानी को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग मान्यताएं हैं। हालांकि, बिल्ली की समाधि अब आश्रम की अनोखी पहचान का हिस्सा बन चुकी है।

पूजा के दौरान मंदिर में साथ रहते हैं कुत्ते-बिल्लियां

मुक्तेश्वर धाम का सबसे अलग दृश्य पूजा और प्रार्थना के दौरान देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में कुत्ते और बिल्लियां भी नजर आती हैं।

घंटियों और प्रार्थना के बीच इन जानवरों का मंदिर परिसर में मौजूद रहना यहां आने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनता है। आश्रम से जुड़ी मालती कुमारी के अनुसार, यहां रहने वाले कुत्तों और बिल्लियों के लिए रोजाना भोजन तैयार किया जाता है।

यानी इन बेजुबान जानवरों के लिए भोजन की व्यवस्था आश्रम की नियमित दिनचर्या का हिस्सा है।

इंजीनियर से साधक बने पंचानन मित्रा

मुक्तेश्वर धाम की कहानी पगला बाबा यानी पंचानन मित्रा से जुड़ी है। आश्रम से जुड़े लोगों के अनुसार, पंचानन मित्रा पेशे से सिविल इंजीनियर थे, लेकिन बाद में उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर साधना का रास्ता अपनाया।

रांची आने के बाद उन्होंने उस समय सुनसान और जंगल से घिरे कोकर क्षेत्र में साधना शुरू की। आश्रम से जुड़ी मान्यता है कि उन्होंने यहां गुफा में रहकर लंबे समय तक भगवान शिव की साधना की।

बाद में भक्तों के सहयोग से परिसर में मुक्तेश्वर धाम समेत करीब 35 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित किए गए। बताया जाता है कि बाबा ने लगभग 12 वर्षों तक साधना और लोकसेवा की और इसी परिसर में महासमाधि ली।

अमेरिका समेत देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु

मनबोध गोस्वामी के अनुसार, वर्तमान में आश्रम का संचालन मुख्य रूप से दान के माध्यम से होता है। आश्रम में आस्था रखने वाले श्रद्धालु विशेष अवसरों पर विदेशों से भी पहुंचते हैं।

हैदराबाद, बनारस समेत देश के अलग-अलग हिस्सों और झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यहां आते हैं। श्रद्धालु आश्रम की धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के साथ यहां की अनोखी परंपराओं को भी करीब से देखते हैं।

आस्था के साथ बेजुबानों के प्रति संवेदना

मुक्तेश्वर धाम की सबसे खास बात यह है कि यहां धार्मिक आस्था और बेजुबान जानवरों के प्रति संवेदना एक साथ दिखाई देती है। एक ओर भगवान शिव का मंदिर है, तो दूसरी ओर भोली कुत्ते और बिल्ली की समाधियां मौजूद हैं।

किसी श्रद्धालु के लिए ये समाधियां धार्मिक विश्वास का केंद्र हैं, तो किसी के लिए ये पगला बाबा और उनके बेजुबान साथियों के बीच रहे गहरे लगाव की निशानी हैं।

इनसे जुड़ी मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के लिए भोली और ‘षष्ठी मां’ की समाधियां आज भी मुक्तेश्वर धाम की अनोखी पहचान बनी हुई हैं।