कौन है प्रशांत बोस? जिस पर पीएम मोदी की हत्या की साजिश का आरोप, झारखंड में दर्ज थे दर्जनों नक्सली और आपराधिक केस
Ranchi: दशकों लगे लाल आतंक के सूरज को डूबने में अब बस वो नाम और इतिहास के पन्नों में सिमटने के इंतजार में है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने ही देश से नक्सलवाद समाप्त होने की घोषणा कर दी थी.
क्योंकि इतने दशकों का अथक प्रयास आखिरकार रंग लाया. माओवाद अब समाज की जड़ों से मिट चुका है. मजबूत इरादों के साथ लगातार ऑपरेशन और केंद्र और राज्य सरकार के सार्थक प्रयास से नक्सलवाद अब जड़ से खत्म चुका है. इतने वर्षों में सैकड़ों मुठभेड़ और हजारों गिरफ्तारियां हुईं. कई बड़े और छोटे माओवादी एनकाउंटर में ढेर हुए तो कइयों को सुरक्षा बलों ने अपने शिकंजे में लिया.

इन्हीं में से एक बड़ा नाम प्रशांत बोस का है, जिसे साल 2021 में सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी. लेकिन दिनांक 03 अप्रैल 2026 शुक्रवार को माओवाद का सबसे बड़ा चेहरा रहे प्रशांत बोस उर्फ किशन दा ने दुनिया को अलविदा कह दिया. प्रशांत बोस की मौत देश में नक्सलवाद के खात्मे पर आखिरी कील साबित होता हुआ नजर आ रहा है. एजेंसियों के मुताबिक, प्रशांत बोस लंबे समय तक नक्सल संगठन की रणनीति, फंडिंग और ऑपरेशनल प्लानिंग का अहम चेहरा रहा—जिसमें प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की कथित योजना भी शामिल बताई गई.
नक्सल आंदोलन में लंबा सफर
प्रशांत बोस उर्फ किशन दा को माओवादी संगठन के वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे का वरिष्ठ नेता माना जाता रहा है. उसने झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में नेटवर्क खड़ा करने में भूमिका निभाई. रणनीति बनाने, कैडर भर्ती, हथियार जुटाने और हमलों की योजना में उसका नाम एजेंसियां बार-बार लेती रही हैं.
झारखंड में दर्ज 70+ मामले
झारखंड में प्रशांत बोस के खिलाफ 70 से अधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं. इनमें
- यूएपीए/आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत केस,
- सुरक्षाबलों पर हमले,
- विस्फोटक सामग्री की बरामदगी,
- रंगदारी, अवैध फंडिंग और साजिश
जैसे गंभीर आरोप शामिल रहे हैं। कई मामलों में वह वांछित/घोषित आरोपी रहा, जबकि कुछ में आरोप तय हुए.
शीर्ष नेतृत्व पर कथित साजिश
एजेंसियों के अनुसार, माओवादी नेतृत्व के भीतर रणनीतिक बैठकों में हाई-वैल्यू टार्गेट पर हमले की बातें सामने आईं. इसी क्रम में प्रधानमंत्री पर हमले की कथित योजना का जिक्र जांच फाइलों में आया. सुरक्षा कारणों से इन योजनाओं के तकनीकी विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए, लेकिन एजेंसियां इसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा मानती रहीं.
शुरुआती दौर
1990 के दशक
- प्रशांत बोस नक्सली आंदोलन के सक्रिय चेहरों में उभरे
- झारखंड, बिहार और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में संगठन विस्तार
- कैडर भर्ती, वैचारिक प्रशिक्षण और रणनीति निर्माण में भूमिका
संगठन में शीर्ष भूमिका
2000–2010
- माओवादी संगठन के पॉलिटिकल–स्ट्रैटेजिक प्लानर के तौर पर पहचान
- सुरक्षाबलों पर हमलों और बड़े ऑपरेशनों की योजना से नाम जुड़ा
- झारखंड में लगातार मामले दर्ज होना शुरू
झारखंड में केसों की बाढ़
2010–2018
- झारखंड में 70 से अधिक आपराधिक व नक्सली मामले दर्ज
- यूएपीए, विस्फोटक अधिनियम, साजिश, फंडिंग और हमले से जुड़े आरोप
- कई मामलों में वांछित घोषित
शीर्ष नेतृत्व पर हमले की कथित साजिश
2018–2021
- सुरक्षा एजेंसियों की जांच में हाई-वैल्यू टार्गेट पर हमले की कथित योजना का खुलासा
- इसी दौरान नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश से जुड़े आरोप सामने आए
- राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने खतरे को गंभीर बताया
यह बिंदु जांच एजेंसियों के आरोप/इनपुट पर आधारित रहा; तकनीकी विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए।
गिरफ्तारी और पूछताछ
2021–2022
- सुरक्षाबलों की संयुक्त कार्रवाई में प्रशांत बोस गिरफ्त में
- कई राज्यों की पुलिस व केंद्रीय एजेंसियों द्वारा पूछताछ
- नेटवर्क, फंडिंग चैनल और कमांड-स्ट्रक्चर पर अहम जानकारियां मिलने का दावा
कानूनी प्रक्रिया
2022–अब तक
- अलग-अलग अदालतों में मामलों की सुनवाई
- कुछ मामलों में आरोप तय, कुछ में जांच/ट्रायल जारी
- नक्सली नेटवर्क पर दबाव और गतिविधियों में कमी का दावा
वर्तमान स्थिति
वर्तमान
- प्रशांत बोस का नाम नक्सलवाद के सबसे बड़े रणनीतिक चेहरों में गिना जाता है
- एजेंसियां इसे नक्सल नेटवर्क के लिए बड़ा झटका मानती हैं
गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई
सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई के बाद प्रशांत बोस की गिरफ्तारी/हिरासत की जानकारी सामने आई. इसके बाद विभिन्न राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने उससे पूछताछ की. पूछताछ में नेटवर्क, फंडिंग चैनल और रणनीति से जुड़े महत्वपूर्ण खुलासों का दावा किया गया. उसके खिलाफ मामलों की सुनवाई अलग-अलग अदालतों में चली/चल रही है.
नक्सल नेटवर्क पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत बोस जैसे वरिष्ठ नेता की गिरफ्तारी से
- माओवादी नेटवर्क की रणनीतिक क्षमता कमजोर हुई,
- फंडिंग और कमांड-स्ट्रक्चर पर असर पड़ा,
- कई क्षेत्रों में कैडर मूवमेंट धीमा हुआ
हालांकि, एजेंसियां यह भी कहती हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लंबी और बहुस्तरीय है—जिसमें सुरक्षा, विकास और सामाजिक हस्तक्षेप तीनों जरूरी हैं.
प्रशांत बोस का मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरे नक्सली तंत्र की कहानी है जिसने दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दी। प्रधानमंत्री पर हमले की कथित साजिश से जुड़े आरोपों ने इसे और गंभीर बनाया। अब निगाहें अदालतों के अंतिम फैसलों और सरकार की समग्र नक्सल-रोधी रणनीति पर टिकी हैं







