Assam Teacher Recruitment: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन! शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक, भर्ती प्रक्रिया पर सवाल
Assam: असम में शिक्षकों की नियुक्ति से जुड़ी प्रोविंशियलाइजेशन स्कीम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम निर्देश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को निर्देश दिया कि राज्य में इस योजना के तहत स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की नई नियुक्ति या उन्हें सरकारी सेवा में शामिल करने की प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए।
यह मामला असम में वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी सेवा में शामिल करने की कानूनी व्यवस्था से जुड़ा है। इस मामले में दाखिल जनहित याचिका में प्रोविंशियलाइजेशन की प्रक्रिया और उससे जुड़ी भर्ती व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
क्या है प्रोविंशियलाइजेशन स्कीम?
प्रोविंशियलाइजेशन एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत वेंचर शिक्षण संस्थानों में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी सेवा में शामिल किया जाता है।
इस प्रक्रिया के बाद राज्य सरकार उनके निर्धारित वेतन के साथ ग्रेच्युटी, पेंशन और छुट्टी के बदले नकद भुगतान (लीव एनकैशमेंट) जैसी देनदारियों की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर लेती है। ये लाभ राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू मौजूदा नियमों के अनुसार दिए जाते हैं।
स्कीम को क्यों दी गई चुनौती?
इस मामले में दाखिल जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रोविंशियलाइजेशन की मौजूदा व्यवस्था निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के बिना सरकारी सेवा में प्रवेश का रास्ता खोलती है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक रोजगार में नियुक्तियां संविधान के प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए और सभी पात्र उम्मीदवारों को समान अवसर मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं राजेश चौहान और माधव मुकुंद पुजारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें रखीं।
अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि प्रोविंशियलाइजेशन का यह तंत्र संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप नहीं है।
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बिना खुली और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के सरकारी सेवा में शामिल किया जाना इन संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है।
2017 के असम शिक्षा अधिनियम पर भी सवाल
याचिका में विशेष रूप से असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017 के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस कानून के कुछ प्रावधान ऐसे व्यक्तियों के प्रांतीयकरण की अनुमति देते हैं, जिनके पास संबंधित संसदीय अधिनियमों और शिक्षक पात्रता से जुड़े वैधानिक नियमों एवं विनियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं।
बिना न्यूनतम योग्यता वाले शिक्षकों पर भी सवाल
याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि जिन लोगों के पास कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक या शिक्षक पात्रता नहीं है, उन्हें सरकारी या प्रांतीयकृत शिक्षण संस्थानों में कक्षा में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने ऐसे सभी मामलों की व्यापक समीक्षा किए जाने की मांग की है, जिनमें 2011 और 2017 के संबंधित कानूनों के तहत लोगों का प्रांतीयकरण किया गया है।
व्यापक समीक्षा की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से असम सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि 2011 और 2017 के कानूनों के तहत प्रांतीयकृत किए गए सभी शिक्षकों और कर्मचारियों की व्यापक समीक्षा की जाए।
इस समीक्षा का उद्देश्य यह जांचना होगा कि संबंधित कर्मचारियों के पास उस समय लागू संसदीय कानूनों और वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं मौजूद थीं या नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि निर्धारित योग्यता नहीं रखने वाले व्यक्तियों को सरकारी या प्रांतीयकृत शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने से रोका जाए।
भविष्य की भर्ती को लेकर भी बड़ी मांग
याचिका में राज्य सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं को प्रोविंशियलाइजेशन की प्रक्रिया के जरिए शिक्षकों की नई नियुक्ति शुरू करने या अनुमति देने से रोकने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में सरकारी शिक्षण पदों पर होने वाली सभी नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप निष्पक्ष, पारदर्शी, योग्यता-आधारित और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के जरिए ही होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट का मंगलवार का निर्देश असम में प्रोविंशियलाइजेशन के जरिए होने वाली शिक्षक नियुक्तियों के लिए फिलहाल महत्वपूर्ण है। अदालत ने राज्य सरकार और शिक्षा विभागों को इस योजना के तहत स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति या उन्हें सरकारी सेवा में शामिल करने से रोकने का निर्देश दिया है।
अब मामले की आगे की सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि प्रोविंशियलाइजेशन की मौजूदा व्यवस्था संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से असम में प्रोविंशियलाइजेशन के जरिए शिक्षकों की नई नियुक्तियों पर रोक का रास्ता साफ हो गया है और भर्ती प्रक्रिया में योग्यता, पारदर्शिता तथा समान अवसर का मुद्दा केंद्र में आ गया है।







