किसानों के आंदोलन के बीच बड़ी खबर, सरकार ने दो मांगें मानीं, अब आगे की रणनीति पर सबकी नजर
Farmers Protest Against FTA Between India and America: भारत-अमेरिका प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में किसान एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं. किसान दिल्ली के किसान घाट पहुंचे और ट्रेड डील से कृषि क्षेत्र को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने कई किसानों को हिरासत में ले लिया. किसानों का कहना है कि यह समझौता उनके हितों के खिलाफ है. वहीं, इस आंदोलन का असर आगामी पंजाब चुनाव की राजनीति पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है.

किसानों के प्रस्तावित दिल्ली कूच के बीच बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है. सरकार और किसान संगठनों के बीच हुई बातचीत में दो प्रमुख मांगों पर सहमति बन गई है. कई दौर की वार्ता के बाद सरकार ने किसानों की दो अहम मांगें स्वीकार कर ली हैं, जिससे आंदोलन को लेकर जारी गतिरोध कुछ हद तक कम होने की उम्मीद जताई जा रही है.
सूत्रों के अनुसार, किसान प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के बीच हुई बैठक में लंबी चर्चा के बाद यह सहमति बनी. सरकार ने किसानों की मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए उन्हें लागू करने का भरोसा दिया. हालांकि, अन्य लंबित मांगों पर बातचीत आगे भी जारी रखने पर दोनों पक्ष सहमत हुए हैं.
किसान संगठनों ने कहा कि सरकार द्वारा दो मांगें स्वीकार किया जाना सकारात्मक कदम है, लेकिन बाकी मुद्दों पर ठोस समाधान निकलने तक वे पूरी स्थिति की समीक्षा करेंगे. उन्होंने कहा कि आंदोलन को लेकर अंतिम फैसला सभी किसान संगठनों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया जाएगा.
वहीं, सरकार का कहना है कि किसानों की समस्याओं का समाधान बातचीत के माध्यम से निकालना उसकी प्राथमिकता है. सरकार ने आश्वासन दिया कि किसानों के हितों से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी संवाद जारी रहेगा और उचित समाधान खोजने का प्रयास किया जाएगा. सरकार और किसानों के बीच बनी इस सहमति को मौजूदा गतिरोध को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अब सभी की नजर किसान संगठनों की अगली घोषणा और आगे की रणनीति पर टिकी हुई है.

किसानों का मौजूदा दिल्ली कूच एकदिवसीय है लेकिन इसका सियासी असर ज्यादा हो सकता है. दिल्ली कूच साल 2022 की याद भी दिला रहा है जहां चुनाव से कुछ महीने पहले केंद्र सरकार ने विवादित तीन कृषि कानूनों को वापस ले लिया था.
प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में ‘देश बचाओ मोर्चा’ के बैनर तले दिल्ली के किसान घाट पर एक दिवसीय ‘किसान महापंचायत’ आयोजित करने की योजना है. किसान नेताओं ने पहले ही कहा था कि पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में किसान इस महापंचायत में भाग लेंगे.

किसान नेता सरवन सिंह पंढेर बोले- सरकार अनुमति देगी तो जाएंगे, बैरिकेड नहीं तोड़ेंगे
किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा है कि किसान दिल्ली जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन यह पूरी तरह सरकार पर निर्भर करता है कि उन्हें आगे जाने की अनुमति दी जाती है या नहीं. उन्होंने यह भी साफ किया कि किसान किसी भी हाल में बैरिकेड नहीं तोड़ेंगे और सरकार से बातचीत के जरिए ही अपनी बात रखने की कोशिश करेंगे. उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि किसान संगठन फिलहाल टकराव नहीं, बल्कि संवाद के रास्ते पर चलना चाहते हैं.

शंभू सीमा पर रोके गए किसान
हालांकि पंजाब से किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने शंभू बॉर्डर पर बैरिकेडिंग कर रखी है. बड़ी संख्या में किसान शंभू बॉर्डर पर जुटे हुए हैं और बैरिकेड्स हटाए जाने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे दिल्ली की ओर कूच कर सकें. मौके पर करीब 100 बसों के साथ कई छोटे वाहनों में किसान पहुंचे हैं, जिससे बॉर्डर पर भारी भीड़ जमा हो गई है.
अब इस फैसले को लेकर किसान हरियाणा सरकार से नाराज हैं. किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि किसान शांतिपूर्ण ढंग से दिल्ली जाना चाहते हैं, लेकिन हरियाणा सरकार उन्हें शंभू बॉर्डर पर रोक रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई से हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का ‘असली चेहरा’ सामने आ गया है, जबकि वह अक्सर पंजाब आकर राज्य के लोगों से बड़े-बड़े वादे करते हैं.
इससे पहले सोमवार को भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के प्रमुख गुरनाम सिंह चढ़ूनी को पुलिस ने कुरुक्षेत्र में उस समय हिरासत में ले लिया था, जब वह महापंचायत में शामिल होने के लिए दिल्ली जा रहे थे.
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि 'मंगल मिलन' बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका-भारत एफटीए को लेकर भरोसा दिया है और कहा है कि किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी, उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा.

किसानों की चिंता क्या है?
किसानों का कहना है कि अगर यह एफटीए समझौता लागू हो जाता है, तो इसका सीधा असर भारतीय खेती, डेयरी उद्योग और गांवों में रहने वाले लाखों लोगों की रोजी रोटी पर पड़ेगा. उनका मानना है कि विदेशी उत्पादों के बाजार में आने से देसी किसानों को भारी नुकसान होगा और छोटे किसानों का काम धंधा पूरी तरह ठप हो सकता है. यही वजह है कि किसान इस समझौते को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं. इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा गैर राजनीतिक और किसान मजदूर मोर्चा के नेता भी जल्द ही मौके पर पहुंचने वाले हैं. किसान नेता सरवन सिंह पंढेर की मौजूदगी को इस आंदोलन के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.
प्रशासन ने किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया है और पुलिसकर्मी दंगा रोधी गियर में मौके पर मौजूद हैं. हालांकि पिछले आंदोलनों की तुलना में इस बार पुलिस बल की संख्या उतनी ज्यादा नहीं है. शंभू बॉर्डर पर की गई सुरक्षा व्यवस्था से यह साफ है कि प्रशासन किसी भी तरह की अव्यवस्था नहीं चाहता. वहीं किसान संगठनों का कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर पूरा ध्यान नहीं देती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा.
सरकार और किसानों के बीच बनी इस सहमति को मौजूदा गतिरोध को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अब सभी की नजर किसान संगठनों की अगली घोषणा और आगे की रणनीति पर टिकी हुई है.







