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चेक बाउंस केस: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पूर्व-संज्ञान चरण में नहीं होगा अभियुक्त की सुनवाई

 
चेक बाउंस केस: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पूर्व-संज्ञान चरण में नहीं होगा अभियुक्त की सुनवाई

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों (Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138) में एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि पूर्व-संज्ञान चरण (Pre-Cognizance Stage) पर अभियुक्त को सुनवाई का अधिकार नहीं होगा। यानी मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले अभियुक्त को समन जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

यह फैसला न्यायमूर्ति मनमोहन और एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि चेक बाउंस केसों का समय पर निपटारा बेहद ज़रूरी है क्योंकि ये आपराधिक मामलों का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से सहमति

शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के अशोक बनाम फैयाज अहमद (2025 SCC Online Kar 490) केस के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि एनआई अधिनियम एक विशेष कानून है, इसलिए BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) की धारा 223 के तहत अभियुक्त को समन भेजना ज़रूरी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों के तेजी से निपटारे के लिए कई बड़े दिशा-निर्देश जारी किए: 
    •    समन की तामील अब डिजिटल माध्यम से भी होगी – ईमेल, व्हाट्सऐप और मैसेजिंग ऐप के जरिए। शिकायतकर्ता को अभियुक्त का मोबाइल और ईमेल विवरण हलफनामे के साथ देना होगा।
    •    ऑनलाइन भुगतान की सुविधा – हर जिला न्यायालय में क्यूआर कोड/यूपीआई लिंक के जरिए चेक राशि का तुरंत भुगतान किया जा सकेगा। यदि आरोपी राशि चुका देता है, तो मामला खत्म (कंपाउंड) किया जा सकता है।
    •    शिकायत का सारांश अनिवार्य – हर केस के साथ निर्धारित प्रारूप में पक्षकारों, चेक का विवरण, अनादर कारण, नोटिस और मांगी गई राहत का सारांश जोड़ा जाएगा।
    •    ट्रायल में देरी नहीं – निचली अदालतें समरी ट्रायल को समन ट्रायल में बदलने से पहले ठोस कारण दर्ज करेंगी।
    •    प्रश्नावली प्रणाली – शुरुआती चरण में आरोपी से पूछा जाएगा कि क्या वह चेक स्वीकार करता है, क्या देयता मानता है या क्या समझौते को तैयार है।
    •    शारीरिक सुनवाई पर जोर – समन की तामील के बाद सुनवाई कोर्ट में ही होनी चाहिए, केवल शुरुआती चरण में ही डिजिटल सुनवाई हो सकती है।
    •    सायंकालीन अदालतों के लिए नई सीमा – दिल्ली की ₹25,000 सीमा बहुत कम है, इसलिए हाईकोर्ट को व्यावहारिक सीमा तय करने के निर्देश दिए गए।
    •    डैशबोर्ड और निगरानी व्यवस्था – दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को लंबित मामलों और निपटान की रिपोर्टिंग के लिए डिजिटल डैशबोर्ड बनाना होगा। हाईकोर्ट में विशेष समितियां प्रगति पर नज़र रखेंगी।

अदालत का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस मामलों में मुख्य मकसद दंड देना नहीं, बल्कि बकाया राशि की अदायगी और चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना है। इसलिए इन मामलों का त्वरित और तकनीक-आधारित निपटान ज़रूरी है।