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जंगलों की अनदेखी नहीं की जा सकती, पर्यावरण संरक्षण पर Supreme Court की सख्त टिप्पणी

National: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनियंत्रित विकास गतिविधियों और बढ़ते अतिक्रमण के कारण वन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में जंगलों को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए वन संपदा की अनदेखी नहीं की जा सकती.
 
JHARKHHAND

National: देश में वन क्षेत्रों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चिंता जताई है. अदालत ने कहा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे पर्यावरण, जैव विविधता और मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. इसलिए उनकी सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है.

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनियंत्रित विकास गतिविधियों और बढ़ते अतिक्रमण के कारण वन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में जंगलों को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए वन संपदा की अनदेखी नहीं की जा सकती.

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने की. पीठ ने झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें झारखंड हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई थी.

Supreme Court

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कुछ राज्यों में जंगल जैसे कुदरती स्वर्ग हैं जिन्हें बचाने की जरूरत है. जेएसपीसीबी के वकील ने हाई कोर्ट की बातों का जिक्र किया और कहा कि सब कुछ रुका हुआ है.

सीजेआई ने वकील से कहा, "कुछ ही राज्य हैं जहां हम सच में अपने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा कर सकते हैं और आप (झारखंड) उनमें से एक हैं." पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट इस मामले पर विचार कर रहा है और इसे वहां अंतिम सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है. पीठ ने कहा, "हाईकोर्ट को अंतिम आदेश पास करने दें."

हाई कोर्ट की बातों के बारे में, पीठ ने साफ किया कि वह हाई कोर्ट का हौसला नहीं गिरा सकती और जोर देकर कहा कि हाई कोर्ट संवैधानिक कोर्ट है.

पीठ ने कहा, ‘‘हम हाई कोर्ट को सलाह देने के लिए प्रधानाचार्य नहीं हैं कि क्या करें और क्या न करें.’’ साथ ही पीठ ने यह स्पष्ट किया कि वह हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं है.

वकील ने पीठ से अनुरोध किया कि उन्हें अपनी अर्जी वापस लेने की इजाजत दी जाए. इस पर पीठ ने वकील को याचिका वापस लेने की इजाजत देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट के सामने सभी मुद्दे उठाने का हक होगा.

अप्रैल में, हाई कोर्ट ने जंगल की सीमाओं या जंगल की जमीन के पास पत्थर के खनन या स्टोन क्रशर लगाने की मंज़ूरी के बारे में निर्देश दिए थे. इसमें कहा गया है कि पत्थर के खनन के लिए जंगल की सीमा से 500 मीटर के दायरे और स्टोन क्रशर के लिए 400 मीटर के दायरे में मंजूरी देने पर रोक लागू होगी.

जनवरी में, हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि राज्य के अंदर सुरक्षित जंगलों की तय सीमाओं से एक किलोमीटर के अंदर पत्थर के खनन या स्टोन क्रशर के लिए कोई मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए. कोर्ट जेएसपीसीबी के जारी एक नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जंगल या जंगल की जमीन के आसपास पत्थर की खदानें और स्टोन क्रशर लगाने के लिए कम से कम दूरी को पहले से तय 400-500 मीटर से घटाकर 250 मीटर कर दिया गया है.