‘कैंसर का धुआं’ बन रहा मोरेना! विदेशों के कबाड़ टायर जलाकर जहरीली कमाई, गांवों में मौत की आहट
इलाके में करीब 13 टायर पायरोलिसिस (TPO) यूनिटें संचालित हैं, जहां पुराने रबर टायर जलाकर तेल, स्टील और कार्बन ब्लैक निकाला जाता है। दावा है कि इन प्लांटों को सिर्फ भारतीय टायर प्रोसेस करने की अनुमति है, लेकिन जांच में सामने आया है कि विदेशों से आयातित स्क्रैप टायर भी यहां जलाए जा रहे हैं।
आयात पर रोक, फिर भी बढ़ता कारोबार
भारत ने 2022 में पायरोलिसिस के लिए स्क्रैप टायर आयात पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बावजूद आयात में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। आरोप है कि ‘रबर स्क्रैप’ के नाम पर टायर मंगाए जाते हैं और कागजों में उन्हें वैध रीसाइक्लिंग के लिए दिखाया जाता है, जबकि हकीकत में वे छोटे-छोटे प्लांटों में जलाए जा रहे हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि टायर जलने से निकलने वाली गैसों में PAHs, डाइऑक्सिन, फ्यूरान और भारी धातुएं शामिल होती हैं, जो कैंसर, फेफड़ों की बीमारी और किडनी डैमेज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाती हैं।
गांवों में बीमारी और बेरोजगारी की दोहरी मार
लोहगढ़ और आसपास के गांवों के लोग दावा करते हैं कि पानी 300 फीट गहराई तक दूषित हो चुका है। खेतों की मिट्टी पर काली परत जम रही है। कई परिवारों में सांस और त्वचा रोग के मामले बढ़े हैं।
वहीं दूसरी ओर, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर रोजाना 500-800 रुपये की मजदूरी पर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि कुछ महीनों से ज्यादा इस माहौल में टिक पाना मुश्किल है।
निगरानी तंत्र पर सवाल
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि शिकायतों पर कार्रवाई की जाती है और नियम उल्लंघन मिलने पर नोटिस भी जारी होते हैं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि निरीक्षण की सूचना पहले ही फैक्ट्री मालिकों तक पहुंच जाती है, जिससे कागजी अनुपालन दिखाकर काम फिर शुरू कर दिया जाता है।
कचरे का वैश्विक खेल
रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में वेस्ट टायर भारत भेजे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) नीति के तहत क्रेडिट कमाने की होड़ में आयातित टायरों की खपत बढ़ी है।
मध्य प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में सैकड़ों पायरोलिसिस प्लांट चल रहे हैं। सवाल यह है कि क्या भारत विकसित देशों का “कचरा घर” बनता जा रहा है?
मोरेना के गांवों में रात ढलते ही धुएं की चादर फिर फैल जाती है। काले पानी में चांद की परछाईं चमकती जरूर है, लेकिन वह चमक विकास की नहीं, एक जहरीली सच्चाई की है—जहां रोजी-रोटी और जिंदगी के बीच संघर्ष जारी है।







