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दामाद के लिए विशेष भोज और आशीर्वाद, बंगाल में क्यों धूमधाम से मनाई जाती है जमाई षष्ठी?

Kolkata:जमाई षष्ठी का संबंध माता षष्ठी की पूजा से माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता षष्ठी संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली की देवी हैं. इस अवसर पर महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं और दामाद को आशीर्वाद देकर विशेष भोजन कराती हैं.
 
WEST BENGAL FESTIVAL

Kolkata: बंगाली समाज में मनाया जाने वाला जमाई षष्ठी रिश्तों, सम्मान और पारिवारिक प्रेम का एक खास पर्व है. इस दिन सास अपने दामाद (जमाई) को घर बुलाकर विशेष सत्कार करती हैं और उनके सुख, समृद्धि तथा लंबी आयु की कामना करती हैं. पश्चिम बंगाल समेत देश-विदेश में बसे बंगाली परिवारों में यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है.

Jamai Sasthi 2026: कब मनाई जाएगी जमाई षष्ठी? जानें तिथि और धार्मिक महत्व

बांग्ला कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को जमाई षष्ठी मनाई जाती है. इस वर्ष यह पर्व 20 जून 2026 को मनाया जाएगा. इस खास अवसर पर बेटी और दामाद को घर बुलाया जाता है और पूरे परिवार के साथ खुशियां साझा की जाती हैं. जमाई षष्ठी का संबंध माता षष्ठी की पूजा से माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता षष्ठी संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली की देवी हैं. इस अवसर पर महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं और दामाद को आशीर्वाद देकर विशेष भोजन कराती हैं.

Jamai Sasthi, wrapped in folklore - The Tribune

इस दिन दामाद के स्वागत के लिए तरह-तरह के पारंपरिक बंगाली व्यंजन बनाए जाते हैं. मछली, मिठाइयां और कई विशेष पकवानों से उनका सत्कार किया जाता है। यही वजह है कि इसे बंगाल का सबसे अनोखा पारिवारिक त्योहार भी कहा जाता है.

When Is Jamai Sasthi 2026? All You Need To Know About Date, Rituals &  Timings

कब मनाया जाता है जमाई षष्ठी?

हर साल ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है. बंगाल और बंगाली समुदाय में इसका सांस्कृतिक महत्व बेहद खास माना जाता है. इस दिन घरों में पूजा-पाठ और विशेष भोजन की तैयारियां की जाती हैं.

Jamai sasthi 2026: know date timing and rituals to be followed

जमाई षष्ठी का शाब्दिक अर्थ

“जमाई” का अर्थ दामाद होता है, जबकि “षष्ठी” का अर्थ चंद्र मास का छठा दिन होता है. इस तरह ज्येष्ठ माह की षष्ठी को मनाए जाने वाले इस पर्व को जमाई षष्ठी कहा जाता है. आज यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि रिश्तों में प्रेम और सम्मान को मजबूत करने वाला पारिवारिक उत्सव बन चुका है.

समय के साथ यह पर्व केवल परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवारों के बीच प्रेम, अपनापन और रिश्तों की मजबूती का प्रतीक बन गया है.