16वीं शताब्दी के मारवाड़ (राजस्थान) के वो राजा जिनकी पत्नी को “रूठी रानी” के नाम से जाना जाता था, जानिए उनकी वीरता की कहानी...
Knowledge Segment: यह कहानी शुरू होती है 1530 के दशक से जब जोधपुर के राजा राव मालदेव चारों तरफ अपने राज्य जोधपुर की सीमा बढ़ा रहे थे. उस समय राव मालदेव की छवि एक शौर्य वान और शक्तिशाली राजा की भांति थी. अपने प्रसार कार्य में है राव मालदेव ने जैसलमेर पर भी आक्रमण करने का फैसला किया. इस बात से चिंतित जैसलमेर के राजा राव लूणकरण को जब कोई रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने अपनी बेटी उमादे की शादी राव मालदेव से करवाने का प्रस्ताव उनके सामने रखा.कहा जाता है उमादे बेहद सुंदर और चतुर थी.

इसी वजह से राव मालदेव ने लूणकरण का यह प्रस्ताव स्वीकार किया और उमादे से 1537 में विवाह किया. उमादे भी राव मालदेव जैसे पराक्रमी पति को पाकर काफी खुश थी. जब दोनों की शादी हुई तब उस समय की परंपरा के अनुसार राव लूणकरण ने अपनी बेटी को दहेज में दासिया भी साथ दी. उनमें से एक दासी का नाम था “भारमली” जो दिखने में काफी सुंदर थी.

विवाह संपन्न होने के बाद राव मालदेव जैसलमेर किले में ही रात्रि विश्राम के लिए रुके रहे. उधर उमादे अपने कक्ष में अपने पति का इंतजार कर रही थी. लेकिन राव मालदेव अपनी पत्नी के पास जाने के बजाए महफिल सजा कर बैठ गए. शराब और मौज मस्ती के बीच वह शायद भूल ही गए थे कि उनकी नई नवेली दुल्हन उनका इंतजार कर रही है. लंबा समय बीत जाने के बाद उमादे ने अपनी दासी भारमली को राव मालदेव को बुलाने के लिए भेजा.जब भारमली राव मालदेव को बुलाने पहुंची तो शराब के नशे में धुत राव मालदेव की नजर भारमली के सौंदर्य पर पड़ी. वह अपनी पत्नी के पास जाने के बजाए भारमली के साथ बैठ गए. जब घंटों तक भारमली वापस नहीं आई तो उमादे स्वयं उसे ढूंढते हुए उस कक्ष तक पहुंची जहां राव मालदेव और वह स्वयं थी.
उमादे नज जब अपने पति की यह हरकत अपनी आंखों से देखी तो उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट लग गई.उन्होंने उसी वक्त राजा से कह दिया तुम मेरे लायक नहीं हो. सुबह जब राजाजी नशे से बाहर आए तब उन्हें अपनी हरकत का अंदाजा हुआ.

राजस्थान में रूठी रानी का क्या इतिहास है?
"रूठी रानी"
जैसलमेर के रावल लूणकरण ने मारवाड़ के राव मालदेव से अपनी पुत्री उमादे का विवाह तय किया
राव मालदेव बारात लेकर जैसलमेर पहुंचे
कहते हैं कि रानी उमादे को ये बात पता चली कि उनके पिता रावल लूणकरण राव मालदेव को मरवाना चाहते हैं
रानी उमादे ने अपना धर्म निभाते हुए ये बात राजपुरोहित राघवदेव के ज़रिए रावजी को बता दी, तो रावजी बड़े क्रोधित हुए
फिर विवाह की पहली रात को राव मालदेव नृत्यगान का आनंद लेते रहे और रानी उमादे के पास नहीं गए
रानी उमादे को इस बात से बड़ा क्रोध आया और वे वहां से चली गईं
राव मालदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने रानी उमादे को मनाने के लिए अपने भतीजे ईश्वरदास व आसा बारहठ को भेजा
काफी मनाने के बाद जब रानी उमादे साथ चलने को तैयार हो गईं, तब मार्ग में कोई बात निकली, जिसके बाद आसा बारहठ ने एक दोहा कहा
"मान रखे तो पीव तज,
पीव रखे तज मान।
दो दो गयंद न बंधही,
हेको खम्भु ठाण।।"
अर्थात मान रखना है तो पति को त्याग दो और पति रखना है तो मान को त्याग दो, लेकिन दो हाथियों का एक ही स्थान पर बाँधा जाना असंभव है।
यह सुनकर रानी उमादे ने प्रण लिया कि आजीवन रावजी का चेहरा नहीं देखूंगी।
तब रानी उमादे ने अजमेर के तारागढ़ दुर्ग के निकट महल में रहना शुरू किया और ये रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध हुईं
राव मालदेव ने रूठी रानी के लिए तारागढ़ दुर्ग में पैर से चलने वाली रहट का निर्माण करवाया।
जब अजमेर पर अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के आक्रमण की संभावना थी, तब रूठी रानी कोसाना चली गईं, जहां कुछ समय रुकने के बाद गूंदोच चली गईं
गूंदोच में समय बिताकर रूठी रानी ने मेवाड़ के केलवा में निवास किया
1562 ई. में जब राव मालदेव के देहांत की खबर पहुंची तो रूठी रानी रावजी का स्मरण कर सती हो गईं
अब रानी उमादे किसी भी सूरत में राव मालदेव के साथ जोधपुर चलने को तैयार नहीं थी. तमाम कोशिशों के बावजूद भी रानी उमादे नहीं मानी और राव मालदेव को बिना दुल्हन की अपनी बारात वापस लानी पड़ी. तब से लगाकर आजीवन उमादे कभी जोधपुर नहीं गई.
हालांकि उसके पश्चात भी राव मालदेव ने कई बार अपने कई दूतों को रानी को लेने भेजा परंतु फिर भी वह नहीं मानी.
आखिरकार 1562 में राव मालदेव की मृत्यु हो गई जिसके बाद रूठी रानी भी उनकी चिता में बैठ सती हो गई और उन्होंने अपने प्राण भी त्याग दिए.

राव मालदेव मारवाड़ के एक प्रतिभाशाली शासक थे जिन्होंने अपने राज्य का काफी विस्तार किया और शेरशाह सूरी को भी हराया. उनकी पत्नी उमादे ने गलती से अपनी सुहागरात उनकी दासी के साथ बिताई थी, जिसके बाद उन्हें “रूठी रानी” नाम मिला. अपमान से क्षुब्ध होकर उमादे ने मालदेव के साथ रहने से इनकार कर दिया और अपना गौरव बनाए रखने का फैसला किया. उनके मनमुटाव के बावजूद रूठी रानी ने मालदेव की मृत्यु पर सती होकर अपनी भक्ति दिखाई. इस कृत्य ने उनकी कहानी को राजस्थानी लोककथाओं में सम्मान और गौरव का प्रतीक बना दिया है.







