वह विद्रोह जिसने ममता की तृणमूल को हिलाकर रख दिया, अब नेतृत्व पर उठ रहे सवाल...वर्ल्ड मीडिया ने कहा- ‘एक अदम्य योद्धा का दुखद अंत’
Kolkata: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (टीएमसी) इन दिनों एक ऐसे राजनीतिक विद्रोह का सामना कर रही है, जिसने पार्टी की आंतरिक एकता और नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. लंबे समय से संगठन के भीतर दबे असंतोष ने अब खुलकर राजनीतिक चुनौती का रूप लेना शुरू कर दिया है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के एक महीने से भी कम समय में , पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने न केवल राज्य में सत्ता खो दी, बल्कि उस पार्टी पर से भी अपना नियंत्रण खो दिया जिसकी स्थापना उन्होंने 28 साल पहले की थी. 3 जून को, तृणमूल टिकट पर चुनाव जीतने वाले 80 विधायकों में से 58 ने पार्टी नेतृत्व के फरमान के खिलाफ विद्रोह करते हुए निष्कासित विधायक ऋतब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना और राज्य में "प्रमुख विपक्षी" होने का दावा किया. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस पार्टी से खुद को अलग नहीं किया और कहा कि ममता बनर्जी अभी भी उनकी नेता हैं. ऋतब्रता बनर्जी ने मीडिया से बात करते हुए उनसे "मुख्य सलाहकार" बनने का अनुरोध भी किया.
दुनिया भर के विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को ‘जुझारू और अदम्य लड़ाकू’ (Tenacious Leader) नेता बताया. यह भी बताया कि कैसे अपने ही भतीजे अभिषेक बनर्जी के अंधमोह और कॉरपोरेट सिंडिकेट (I-PAC) के चक्रव्यूह में फंसकर उन्होंने अपनी ही बनायी सल्तनत पर से अपना पूरा नियंत्रण खो दिया.
वैश्विक मीडिया की नजरों में ममता बनर्जी की क्रोनोलॉजी
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ममता बनर्जी के राजनीतिक ग्राफ को 3 मुख्य हिस्सों में बांटकर दुनिया के सामने पेश किया है, जो इस संकट की कड़वी हकीकत बयां करता है.
- वैश्विक लेखों में कहा गया है कि ममता बनर्जी ने 3 दशक पहले अपने दम पर वामपंथ के क्रूर शासन के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खाकर तृणमूल कांग्रेस खड़ी की थी. वह भारत की सबसे जुझारू महिला नेताओं में शुमार थीं, जिन्होंने जमीन से उठकर कोलकाता की सत्ता पर कब्जा किया था.
- ‘द गार्जियन’ के एक विशेष लेख के अनुसार, ममता बनर्जी की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अघोषित ‘युवराज’ घोषित करना रही. इसके चलते पार्टी के संस्थापक और सबसे वफादार जमीनी चेहरे (ओल्ड गार्ड) पूरी तरह अलग-थलग पड़ते चले गये.
- विदेशी अखबारों ने लिखा है कि चुनावी रणनीतिकार एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के कॉरपोरेट दखल ने विधायकों और सांसदों के टिकट तय करने शुरू कर दिये, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का भरोसा कालीघाट से टूट गया. इसी का नतीजा रहा कि 2026 के चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया और पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी.

Global Media on TMC Revolt:
- वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि किसी राष्ट्रीय दल के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों का एक साथ पाला बदलकर एनडीए (NDA) को समर्थन दे देना भारतीय संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी बगावतों में से एक है.
- डॉ काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चल रही साइन-गेट (फर्जी हस्ताक्षर मामले) की सीआईडी जांच ने साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर का अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है.
- ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट में दिल्ली में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की भावुक मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि जो क्षेत्रीय क्षत्रप कभी दिल्ली की सत्ता में ‘किंगमेकर’ बनने का सपना देख रही थीं, आज वे राष्ट्रीय राजनीति में अपने वजूद को बचाने के लिए बेहद असहाय और अकेली खड़ी नजर आ रही हैं.

क्या फिर से उठ खड़ी होंगी ममता? विश्लेषकों ने दिये ये संकेत
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए अब इस गहरे दलदल से बाहर निकलना लगभग असंभव प्रतीत होता है. राज्य में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नयी सरकार का तेजी से पैर पसारना और सचिवालय ‘नबान्न’ की दीवारों का भगवाकरण यह दिखाता है कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति अब पूरी तरह बदल चुकी है.
अस्तित्व की अंतिम लड़ाई
विदेशी मीडिया ने अपने निष्कर्ष में लिखा है कि तृणमूल कांग्रेस इस समय बिल्कुल उसी तरह के लिविंग इन्फर्नो (अंदरूनी विनाश) से गुजर रही है, जैसा कुछ साल पहले महाराष्ट्र की शिवसेना और एनसीपी ने झेला था. महुआ मोईत्रा और कल्याण बनर्जी जैसे गिने-चुने वफादार नेताओं के तीखे बयानों के बावजूद यूसुफ पठान जैसे बड़े चेहरों की रहस्यमयी चुप्पी यह साफ बयां करती है कि ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी की कमान हमेशा के लिए फिसल चुकी है.







