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जहां गिरी थी सती की अंगुली, वहीं बना शक्तिपीठ..कालीघाट में दिखता है मां काली का अद्भुत उग्र रूप

Kolkata: कालीघाट मंदिर में स्थापित मां काली की प्रतिमा अपने अनोखे और उग्र स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां देवी की मूर्ति एक पत्थर और एक कन्या के दिव्य स्वरूप की प्रेरणा से निर्मित की गई थी. प्रतिमा में मां की लंबी स्वर्ण जिह्वा, बड़ी आंखें और उग्र भाव भक्तों को शक्ति और साहस का संदेश देते हैं.
 
WEST BENGAL

Kolkata: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के शरीर का दाहिने पैर की अंगुली (कुछ मान्यताओं में पैर का अंग) इसी स्थान पर गिरा था. यही कारण है कि कालीघाट को अत्यंत पवित्र शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है और यहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

Kali Ghat : काली घाट में गिरी है सती के दाहिने पैर की उंगलियां, जानें किस  चीज से बनी है यहां मां की प्रतिमा

कालीघाट मंदिर में स्थापित मां काली की प्रतिमा अपने अनोखे और उग्र स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां देवी की मूर्ति एक पत्थर और एक कन्या के दिव्य स्वरूप की प्रेरणा से निर्मित की गई थी. प्रतिमा में मां की लंबी स्वर्ण जिह्वा, बड़ी आंखें और उग्र भाव भक्तों को शक्ति और साहस का संदेश देते हैं.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित कालीघाट काली मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और 51 शक्तिपीठों में से एक है. गंगा की एक पुरानी धारा, जिसे अब ‘अदी गंगा’ कहा जाता है, के किनारे बसे इस मंदिर का इतिहास और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा माना जाता है. माना जाता है कि यहां देवी सती के दाहिने पैर की उंगलियां गिरी थीं, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ.

All pervading Mother of the Universe, Kalighat Kali temple , Kolkata.  Kalighat is regarded as one of the 51 Shakti Peethas of India, where the  various parts of Sati's body are said

जीवंत दिखता है मां का उग्र रूप

मंदिर में स्थापित मां काली का स्वरूप अत्यंत अनोखा है. यहां की मूर्ति अन्य काली प्रतिमाओं से अलग है. काले पत्थर से बनी इस प्रतिमा का लंबा बाहर निकला लाल जिह्वा, सोने की नाक की नथ और तीन बड़े नेत्र देवी के उग्र रूप को दर्शाते हैं. मूर्ति के निर्माण में नीम की लकड़ी और पत्थर का मिश्रण किया गया है, जो इसे खास बनाता है. प्रतिमा के आसपास चांदी और सोने की अलंकरणों का प्रयोग इसे दिव्य रूप प्रदान करता है.

कालीघाट मंदिर का इतिहास लगभग 350 वर्ष पुराना माना जाता है, हालांकि यह स्थान उससे भी पहले से उपासना का केंद्र रहा है. वर्तमान मंदिर संरचना का निर्माण 19वीं शताब्दी में करवाया गया था. यह स्थान न केवल बंगाल, बल्कि पूरे देश के भक्तों के लिए अत्यंत पूजनीय माना जाता है. विशेष रूप से कालरात्रि, दीपावली, नवरात्रि और काली पूजा के समय यहां भारी भीड़ उमड़ती है.

मंदिर परिसर के पास स्थित नखोदा तालाब, भक्त निवास, और प्रसाद गलियां भक्तों के लिए धार्मिक अनुभव को और भी समृद्ध बनाती हैं. यहां प्रतिदिन हजारों लोग दर्शन के लिए आते हैं. कलिघाट की गलियों में बंगाली संस्कृति, परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.