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देशभर में UGC की नई गाइडलाइन पर क्यों मचा है इतना बवाल? आखिर नए गाइडलाइंस में क्या है ऐसा जिनसे सवर्ण समाज में फूटा राजा गुस्सा

UGC NewGuideline: यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में दो अहम बदलाव किए हैं, सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी से आने छात्रों के साथ भेदभाव बताया जा रहा है. बिहार, झारखंड, यूपी समेत तकरीबन पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है. उनका मानना है कि सिर्फ जनरल कैटेगरी भर के होने से ही वो दोषी हो जाएंगे.
 
UGC NewGuideline

UGC New Guideline: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी. अंग्रेजी में इसे University Grants Commission कहते हैं. कमोबेश देश भर के हायर एजुकेशन सिस्टम को यही आयोग कंट्रोल करता है. 

12वीं के बाद जो भी छात्र ग्रेजुएशन या आगे की पढ़ाई के लिए एनरॉल होते हैं, उन्हें इसके नियमों से सामना होता है. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जन जाति (ST) के छात्रों के लिए यूजीसी ने कुछ खास नियम बना रखे हैं.

कॉलेज में इसका पालन जरूरी होता है. पहली बार वही नियम OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जातियों से आने वाले छात्रों को शामिल किया गया है. यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में दो अहम बदलाव किए हैं, सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी से आने छात्रों के साथ भेदभाव बताया जा रहा है.

बिहार, झारखंड, यूपी समेत तकरीबन पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है. उनका मानना है कि सिर्फ जनरल कैटेगरी भर के होने से ही वो दोषी हो जाएंगे.

सरकार की ओर से कोई बड़ा नेता इस मसले पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है। देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं और जिस यूजीसी ने इस नियम को लागू किया है, उसके चेयरमैन विनीत जोशी हैं.

यूजीसी के नए नियम का देशभर में विरोध

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को नई नियमावली लागू की है.

15 जनवरी से प्रभावी हुए इन नियमों का उद्देश्य SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों और शिक्षकों के लिए परिसर में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है. नियम के मुताबिक जाति-आधारित भेदभाव इससे समाप्त होगा.

हालांकि, इन नियमों ने आरक्षण जैसे एक नए विवाद को जन्म दे दिया है. सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे 'सामान्य वर्ग विरोधी' करार देते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया है. विवाद का मुख्य केंद्र झूठी शिकायतों के खिलाफ दंड का प्रावधान हटाना और सवर्णों को इस सुरक्षा चक्र से बाहर रखना है.

यूजीसी के नए नियमों में क्या है खास?

यूजीसी ने 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' के तहत हर संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) और इक्विटी समितियों का गठन अनिवार्य कर दिया है.

इसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है. इन नियमों के अनुसार, किसी भी संस्थान के प्रमुख (कुलपति या प्राचार्य) को भेदभाव के खिलाफ सीधे जवाबदेह बनाया गया है.

किसकी सिफारिश पर लागू हुआ ये नियम?

बताया जा रहा है कि संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने यूजीसी के ड्राफ्ट रेगुलेशंस की समीक्षा की थी. फिर 8 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह इस समिति के चेयरमैन हैं.

इसी समिति ने यूजीसी को सिफारिशें दीं, जिसके आधार पर भेदभाव वाले नियम में ओबीसी को भी जाति आधारित डिसक्रिमिनेशन में शामिल किया गया. इससे पहले ओबीसी जातियों को यूजीसी के ड्राफ्ट में नहीं रखा गया था. इसी कमेटी ने सिफारिश की कि Equity Committee में SC/ST/OBC से आधे से ज्यादा प्रतिनिधि भी होने चाहिए.

इन सिफारिशों के बाद यूजीसी ने फाइनल रेगुलेशंस में कई बदलाव करते हुए इसे जनवरी 2026 में नोटिफाई कर दिया. जिसमें ओबीसी को शामिल किया गया और झूठी शिकायत पर जुर्माने का प्रावधान को भी हटा दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के चौखट पर यूजीसी की गाइडलाइन

वहीं, ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट के चौखट पर पहुंच चुका है. प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

इस नियम को लेकर एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है, जिसमें यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है.

याचिकाकर्ता का आरोप है कि ये प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है.

याचिका में कहा गया है कि नियम 3(सी) संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है. साथ ही, यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है.

सवर्ण समाज के विरोध की मुख्य वजह

सवर्ण संगठनों का सबसे बड़ा ऐतराज भेदभाव की परिभाषा और शिकायत प्रक्रिया को लेकर है. नए नियमों में 'झूठी शिकायतों' को हतोत्साहित करने वाले 2012 के पुराने प्रावधान को हटा दिया गया है. 

विरोधियों का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के शिक्षकों और छात्रों को निशाना बनाने के लिए कानून का दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि गलत शिकायत दर्ज कराने वाले पर किसी दंड का डर नहीं रहेगा.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह नियम सवर्ण समाज के लिए 'मानसिक आरक्षण' जैसा है, जहां उनकी बात सुनने वाला कोई तंत्र नहीं है. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक सवर्ण संगठनों ने इसे 'संविधान की मूल भावना के खिलाफ' बताया है. 

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, जिससे कैंपस की राजनीति गरमा गई है. ओबीसी जातियों को इसमें शामिल करने और झूठी शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने को लेकर सामान्य वर्ग छात्र इसे दूसरा SC/ST एक्ट बता रहे हैं.

सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक पर जनरल कैटेगरी स्टूडेंट विरोध तेज कर दिए हैं. सामान्य वर्ग छात्रों में यूजीसी के इस नए नियम को लेकर सबसे ज्यादा ओबीसी जातियों को शामिल करने को लेकर हैं, एस-एसटी जातियां तो पहले से ही थी.

इन नियमों का पालन न करने वाले विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर यूजीसी ने कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा है. दोषी पाए जाने वाले संस्थानों को सरकारी ग्रांट (अनुदान) रोकी जा सकती है, उन्हें नई डिग्री शुरू करने से प्रतिबंधित किया जा सकता है और गंभीर मामलों में उनकी मान्यता तक रद्द की जा सकती है.

जनरल कैटेगरी से आने वाले छात्रों का मानना है कि ये नियम उन्हें पहले से 'दबाने वाला' मान लिया गया है. 

वहीं, SC/ST/OBC को पीड़ित मान लिया गया है. इनका ये भी कहना है कि अगर कोई जनरल कैटेगरी का छात्र जाति-आधारित भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके लिए कोई सुरक्षा कवच नहीं है. फाल्स कम्पलेन से करियर बर्बाद होने का खतरा है. वे इसे आरक्षण की तरह एकतरफा पॉलिसी बता रहे हैं.