Newshaat_Logo

क्या बदल जाएगी फांसी की सजा? सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने छेड़ी नई बहस..सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला...

SC Rejects Ban on Hanging: सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा खत्म करने और कम दर्दनाक तरीके अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित सबूत सामने आने पर इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा का रास्ता खुला रहेगा.
 
NATIONAL

National: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फांसी की सजा को खत्म करने और इसकी जगह कम दर्दनाक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित सबूत सामने आने पर फांसी देने के तरीके की संवैधानिक समीक्षा का रास्ता खुला रहेगा।

Capf:सीएपीएफ इंस्पेक्टरों की 'सुप्रीम' जीत, पहले Slp रद्द तो अब रिव्यू  पिटीशन खारिज, Mha के पाले में गेंद - Capf Inspectors' 'supreme' Victory:  After Slp Dismissal, Review Plea ...

केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति बनाकर करा सकती है समीक्षा

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उसके फैसले से केंद्र सरकार को फांसी की मौजूदा प्रक्रिया की विशेषज्ञ समीक्षा कराने से नहीं रोका गया है। सरकार कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस, क्रिमिनोलॉजी और संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों वाली समिति गठित कर सकती है।

इस समीक्षा का उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि क्या मौत की सजा देने का कोई ऐसा वैकल्पिक तरीका मौजूद है, जो दोषी की गरिमा बनाए रखते हुए अनावश्यक पीड़ा को कम करने के संवैधानिक उद्देश्य को बेहतर तरीके से पूरा कर सके।

भविष्य में संवैधानिक समीक्षा का रास्ता खुला

फैसला सुनाते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि याचिका खारिज किए जाने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में फांसी की संवैधानिक वैधता की जांच का रास्ता बंद हो गया है।

पीठ के अनुसार, यदि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित साक्ष्य सामने आते हैं और यह साबित होता है कि ‘दीना’ मामले में जिस तथ्यात्मक एवं वैज्ञानिक आधार पर फैसला लिया गया था, वह बाद के घटनाक्रमों के कारण महत्वपूर्ण रूप से बदल चुका है, तो इस मुद्दे पर दोबारा संवैधानिक जांच की जा सकती है।

‘दीना’ मामले के फैसले को बड़ी बेंच में भेजने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 354 और BNSS की धारा 393(5) से जुड़े प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करने के लिए ‘दीना’ मामले में दिए गए फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया।

पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में तीन जजों की बेंच के फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।

2017 में दायर हुई थी याचिका

यह मामला वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा की ओर से वर्ष 2017 में दायर याचिका से जुड़ा था। याचिका में तत्कालीन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान में मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी देने का प्रावधान है।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि फांसी को मौत की सजा देने के तरीके के रूप में समाप्त किया जाना चाहिए और इसकी जगह घातक इंजेक्शन जैसे वैकल्पिक तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया था कि दुनिया के कई देशों ने फांसी देने की व्यवस्था को पहले ही समाप्त कर दिया है।

संविधान की व्याख्या को बताया ‘ऑर्गेनिक’

पीठ ने कहा कि संविधान की व्याख्या स्थिर नहीं है, बल्कि यह ‘ऑर्गेनिक’ प्रक्रिया है। इसे संवैधानिक विचारों के विकास के साथ-साथ वैज्ञानिक ज्ञान में होने वाली प्रगति के प्रति भी संवेदनशील रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फांसी की सजा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी, लेकिन साथ ही केंद्र सरकार के लिए विशेषज्ञ समीक्षा की संभावित गुंजाइश स्पष्ट कर दी है। इससे भविष्य में वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर फांसी के विकल्पों पर बहस का रास्ता खुला रह सकता है।