Newshaat_Logo

बांकीपुर उपचुनाव बना प्रतिष्ठा की जंग, भाजपा की साख और प्रशांत किशोर की राजनीतिक परीक्षा एक साथ

 
बांकीपुर उपचुनाव बना प्रतिष्ठा की जंग, भाजपा की साख और प्रशांत किशोर की राजनीतिक परीक्षा एक साथ

Bihar news: बिहार की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शुमार बांकीपुर एक बार फिर राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गई है। 30 जुलाई को होने वाला उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि इसे भाजपा और जन सुराज के बीच प्रतिष्ठा की सीधी लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर भाजपा अपने तीन दशक पुराने मजबूत गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, तो दूसरी ओर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार चुनावी मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह उपचुनाव भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद खाली हुई सीट पर हो रहा है। नितिन नवीन लगातार पांच बार इस सीट से विधायक रहे हैं और उनकी वजह से बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का अभेद्य किला माना जाता रहा है। ऐसे में पार्टी के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की बड़ी परीक्षा है।

वहीं, चुनावी रणनीतिकार के तौर पर राष्ट्रीय पहचान बना चुके प्रशांत किशोर के लिए यह मुकाबला बेहद अहम माना जा रहा है। वर्षों तक अलग-अलग राज्यों में चुनावी रणनीति तैयार करने वाले प्रशांत किशोर अब पहली बार खुद जनता के बीच वोट मांग रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य और जनस्वीकृति की बड़ी कसौटी बन गया है।

हालांकि, बांकीपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां के मतदाता प्रचार और लोकप्रियता से ज्यादा स्थानीय संगठन और मजबूत राजनीतिक पकड़ को महत्व देते रहे हैं। इसका उदाहरण वर्ष 2020 का विधानसभा चुनाव है, जब द प्लुरल्स पार्टी की संस्थापक पुष्पम प्रिया चौधरी ने व्यापक प्रचार अभियान चलाया, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया। उस चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन ने भारी मतों से जीत दर्ज की थी, जबकि पुष्पम प्रिया को बेहद कम वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गई थी।

जन सुराज के लिए भी पिछले चुनावी आंकड़े चुनौती पेश करते हैं। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा था। बांकीपुर सीट पर भाजपा को करीब 98 हजार वोट मिले थे, जबकि जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को महज 7,717 वोट हासिल हुए थे। ऐसे में इस बार पार्टी के सामने अपना जनाधार मजबूत साबित करने की चुनौती है।

बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास

बांकीपुर विधानसभा सीट बिहार की राजनीति में हमेशा से अहम रही है। इस सीट ने राज्य को दो मुख्यमंत्री दिए हैं। वर्ष 1962 में यहां से निर्वाचित कृष्ण बल्लभ सहाय बाद में मुख्यमंत्री बने, जबकि 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा इसी सीट से जीतकर बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद जनसंघ और भाजपा ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बनाई। 1995 से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में रही है और नितिन नवीन ने इस पर पार्टी की स्थिति और मजबूत की।

सबकी निगाहें चुनावी नतीजों पर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक विधायक का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भाजपा की शहरी पकड़ और प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता का भी बड़ा संकेत होगा। यही वजह है कि इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले पर पूरे बिहार ही नहीं, देशभर की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं।