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सम्राट सरकार का बड़ा फैसला! सवर्ण भूमिहीन परिवारों की होगी पहचान

CM Samrat Chaudhary: बिहार सरकार भूमिहीन सवर्ण परिवारों की पहचान और गिनती कराने की तैयारी में है. सरकार की ओर से जल्द इस प्रक्रिया को शुरू किए जाने की बात सामने आई है. इसके जरिए भूमिहीन परिवारों की स्थिति का आकलन कर आगे की नीतियां और योजनाएं तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
 
Bihar

Bihar Politics:  बिहार सरकार अब राज्य के भूमिहीन और गरीब सवर्ण परिवारों का डेटा जुटाने जा रही है। आजादी के बाद पहली बार राज्य स्तर पर भूमिहीन सवर्णों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने की कवायद शुरू की गई है। इसके लिए राज्य उच्च जाति आयोग ने सभी जिलों के नोडल अधिकारियों को जरूरी जानकारी जुटाने और भूमिहीन सवर्ण परिवारों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं। सर्वे के आधार पर पात्र परिवारों को नियमानुसार वासगीत का पर्चा दिलाने के साथ केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की तैयारी है।

राज्य उच्च जाति आयोग की ओर से आयोजित दो दिवसीय प्रमंडल स्तरीय बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। आयोग ने सारण, पटना, मगध और दरभंगा प्रमंडलों के नोडल अधिकारियों के साथ समीक्षा की। आयोग के अध्यक्ष महाचंद्र प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में करीब चार घंटे तक दो शिफ्टों में बैठक चली। इसमें आयोग के उपाध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद और सदस्य जयकृष्ण झा भी मौजूद रहे।

बैठक में नोडल अधिकारियों को अपने-अपने जिलों में सर्वे कर भूमिहीन सवर्ण परिवारों की सूची तैयार करने का निर्देश दिया गया है। इसके तहत ऐसे परिवारों की आर्थिक और आवासीय स्थिति की जानकारी जुटाई जाएगी, जिनके पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। आयोग का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों की पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना है।

इस पहल के तहत पात्र भूमिहीन सवर्ण परिवारों को नियमानुसार वासगीत का पर्चा उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई की जाएगी। वासगीत का पर्चा मिलने से ऐसे परिवारों को अपने आवास के लिए कानूनी आधार मिल सकेगा। इसके अलावा उन्हें केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने का रास्ता भी आसान होगा।

बैठक में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत आरक्षण का वास्तविक लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया। आयोग के अधिकारियों ने कहा कि केवल आंकड़े तैयार करना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं से जोड़ना भी जरूरी है।

बिहार में जाति आधारित सर्वे के बाद अलग-अलग सामाजिक समूहों की आबादी और आर्थिक स्थिति को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में सामान्य या अनारक्षित वर्ग की आबादी करीब 15.52 प्रतिशत है। इसमें ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ समेत कई सवर्ण समुदाय शामिल हैं। अब भूमिहीन सवर्ण परिवारों का अलग से डेटा तैयार करने की पहल को सामाजिक और आर्थिक नीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस डेटा से सरकार को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि सामान्य वर्ग में कितने परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और कितने परिवारों के पास रहने के लिए अपनी जमीन तक नहीं है। इसके आधार पर जरूरतमंद परिवारों के लिए सरकारी योजनाओं और सहायता का दायरा तय करने में भी मदद मिल सकती है।

इस पहल के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। बिहार की राजनीति में सवर्ण मतदाताओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। करीब 15.52 प्रतिशत आबादी वाले इस वर्ग का प्रभाव कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के चुनावी नतीजों पर दिखाई देता है। ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ समुदाय लंबे समय से राज्य के राजनीतिक समीकरणों में प्रभावशाली रहे हैं।

खास तौर पर एनडीए के लिए सवर्ण मतदाता एक महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं। वहीं प्रशांत किशोर के नेतृत्व में जन सुराज के सक्रिय होने के बाद सवर्ण वोटरों के बीच नए राजनीतिक विकल्प को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। ऐसे में भूमिहीन सवर्णों की पहचान और उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने की पहल का सामाजिक प्रभाव तो होगा ही, इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। हालांकि सरकार की इस कवायद का तत्काल उद्देश्य भूमिहीन और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहचान कर उन्हें नियमानुसार सरकारी सहायता और योजनाओं का लाभ दिलाना बताया जा रहा है। आने वाले समय में जिलों से जुटाए जाने वाले आंकड़ों से बिहार में भूमिहीन सवर्ण परिवारों की वास्तविक संख्या और उनकी जरूरतों की तस्वीर और स्पष्ट होगी।