बिहार में बदल रहे सियासी समीकरण? सम्राट चौधरी और चेतन आनंद की नजदीकियों पर चर्चा..क्या बदल जाएगा सत्ता का गणित?
Bihar Politics: बिहार की राजनीति में इन दिनों डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और नेता प्रतिपक्ष चेतन आनंद को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. दोनों नेताओं के बीच बढ़ती राजनीतिक नजदीकियों और हालिया गतिविधियों ने राज्य के सियासी गलियारों में नए समीकरणों की अटकलों को हवा दे दी है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में आगामी चुनावों से पहले नए गठजोड़ और सत्ता संतुलन की संभावनाएं लगातार मजबूत हो रही हैं. सम्राट चौधरी जहां भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरे माने जाते हैं, वहीं चेतन आनंद भी युवा राजनीति में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं. ऐसे में दोनों नेताओं की सक्रियता को लेकर कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं.
इस नई समिति की पूरी कमान सीधे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने हाथों में रखी है. सरकार ने वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी को इस महत्वपूर्ण समिति का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्षों को उपाध्यक्ष पद की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है. शासन स्तर पर इस समिति को बेहद शक्तिशाली माना जा रहा है क्योंकि इसके सभी प्रमुख सदस्यों को राज्य उपमंत्री स्तर की सुविधाएं दी जाएंगी. इन सुविधाओं में सरकारी गाड़ियां, विशेष स्टाफ और भत्ते शामिल हैं जो इनके प्रशासनिक प्रभाव को बढ़ाएंगे.
चेतन आनंद की एंट्री और अंदरूनी सियासत
समिति के गठन में सबसे ज्यादा ध्यान शिवहर से जेडीयू विधायक चेतन आनंद के नाम ने खींचा है. वह साल 2020 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर चुनाव जीते थे लेकिन बाद में बदले सियासी घटनाक्रम में उन्होंने जेडीयू का दामन थाम लिया था. नई सरकार के गठन के समय उन्हें मंत्री पद नहीं मिलने से उनके समर्थक वर्ग और पिता आनंद मोहन के तेवरों में तल्खी देखी जा रही थी.
हाल के दिनों में दोनों नेताओं की कुछ सार्वजनिक मुलाकातों और राजनीतिक संकेतों ने विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के भीतर हलचल बढ़ा दी है. हालांकि अब तक किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे आने वाले समय की बड़ी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं.

नीलम देवी को जगह और बाहुबली फैक्टर
चेतन आनंद के अलावा मोकामा से विधायक अनंत सिंह को इस सूची में शामिल करना सरकार की एक और बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. जिनका अपने क्षेत्र में मजबूत पारंपरिक जनाधार है. चुनाव से ठीक पहले उन्हें इस उच्च स्तरीय समिति में जगह देकर सरकार ने एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है.
विपक्ष के सवाल और सरकार की खामोशी
इस नई सूची के सामने आते ही विपक्षी दलों ने सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है. विपक्ष का आरोप है कि यह नियुक्तियां किसी विकास कार्य के लिए नहीं बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक दबाव का परिणाम हैं. आलोचकों के अनुसार सरकार अपने नाराज विधायकों और सहयोगियों को संतुष्ट करने के लिए सरकारी पदों और सुविधाओं का इस्तेमाल कर रही है. हालांकि इन आरोपों पर सत्ता पक्ष की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है लेकिन इस फैसले ने राज्य के राजनीतिक तापमान को जरूर बढ़ा दिया है.
बिहार की राजनीति में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं. ऐसे में सम्राट-चेतन समीकरण को भी नए सामाजिक और राजनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले दिनों में यह समीकरण राज्य की सत्ता राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है.







